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मुफ़्त का माल -(लघुकथा )राहिला

पिताजी!उस कमजोर बकरी को जल्दी हृष्ठ-पुष्ट देखने की चाह में स्नेहवश बागीचे से अलग-अलग किस्म की पत्तियां लाकर लगभग जबरन खिलाने की कोशिश कर रहे थे।लेकिन वो ढीठ की बच्ची भूख शांत होने के बाद किसी चींज को मुंह तक ना लगा रही थी।ये देख वे खीज गये और बोले:

"अरी खा ले कम्बख्त!इतने किस्म की पत्तियां मुफ़्त में मिल रही हैं और तू भाव खा रही है ।"
"अजी!गुस्सा क्यों होते हो जी ! मुफ़्त माल है!वो क्या जाने?जानवर है जानवर, इंसान नहीं है "मां कनखियों से देख, छेड़ लेकर बोली।

.
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Rahila on November 10, 2015 at 10:53am
बहुत आभार आदरणीय ओम प्रकाश जी! आपने सही कहा कभी दावतों का नजारा देखिये,लोग फ्री का खाना किस तरह से खाते है । बहुत शुक्रिया आपका, मेरी रचना पर अपने विचार सांझा करने के लिये । सादर नमन ।
Comment by Rahila on November 10, 2015 at 10:48am
बहुत आभार आदरणीय उस्मानी जी!बहुत शुक्रिया ।
Comment by Rahila on November 10, 2015 at 10:47am
बहुत आभार आदरणीय सतविन्दर जी! बहुत शुक्रिया ।
Comment by Rahila on November 10, 2015 at 10:46am
बहुत आभार आदरणीय तेज वीर सिंह जी!बहुत शुक्रिया ।
Comment by Omprakash Kshatriya on November 10, 2015 at 6:15am

आदरणीय राहिला जी , इन्सान और जानवर में यही भेद है. इन्सान मुफ्त का माल खाए जाता है. चाहे भूख हो या न हो. जानवरों के साथ ऐसा नही होता है. बधाई आप को इस शानदार रचना के लिए.

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 9, 2015 at 11:56pm
बहुत बढ़िया प्रस्तुति आदरणीया राहिला जी।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 9, 2015 at 9:24pm
उम्दा रचना के लिए बधाई आदरणीया
Comment by TEJ VEER SINGH on November 9, 2015 at 7:58pm

हार्दिक बधाई राहिला जी!कितना सुंदर और सटीक विश्लेषण किया है आपने मुफ़्त के माल का!पुनः बधाई!

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