For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

लड़ाई मज़हबी फिर से छिड़ी है (ग़ज़ल)

1222 1222 122

कभी है ग़म,कभी थोड़ी ख़ुशी है..
इसी का नाम ही तो ज़िन्दगी है..

हमें सौगात चाहत की मिली है..
ये पलकों पे जो थोड़ी-सी नमी है..

मुखौटे हर तरफ़ दिखते हैं मुझको,
कहीं दिखता नहीं क्यों आदमी है..?

फ़िज़ा में गूँजता हर ओर मातम,
कि फिर ससुराल में बेटी जली है..

सभी मौजूद हों महफ़िल में,फिर भी,
बहुत खलती मुझे तेरी कमी है..

दहल जाए न फिर इंसानियत 'जय',
लड़ाई मज़हबी फिर से छिड़ी है..
=====================

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 543

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by जयनित कुमार मेहता on February 23, 2016 at 10:22pm
आदरणीय राजेश कुमारी जी, हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ आपके प्रति।
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 23, 2016 at 1:49pm

अच्छी ग़ज़ल हुई है जयनित साहब, दाद कुबूल कीजिए।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 26, 2015 at 2:10pm

संशोधन के बाद क्या लाजबाब शेर हुआ है ..बहुत सुन्दर ग़ज़ल शेर दर शेर दाद कुबूलें जयनित जी 

Comment by Ravi Shukla on November 26, 2015 at 1:26pm

आदरणीय जयनित जी मेरे कहे को मान देने के लिये आभार ।

Comment by जयनित कुमार मेहता on November 26, 2015 at 1:05pm

आदरणीय नादिर ख़ान जी, आपको ग़ज़ल पसंद आई,इसके लिए मेरा दिल से धन्यवाद आपको। लगता है मेरा लिखना सार्थक हुआ..

Comment by नादिर ख़ान on November 26, 2015 at 10:56am

दहल जाए न फिर इंसानियत 'जय',
लड़ाई मज़हबी फिर से छिड़ी है.

सही कहा आदरनीय जयनित जी मज़हब की लड़ाई में सबसे ज्यादा नुक्सान इंसानियत को ही होता है।  उम्दा ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद स्वीकार करें  ... 

Comment by जयनित कुमार मेहता on November 25, 2015 at 4:43pm

आदरणीय रवि जी, कहन की त्रुटियों पर ध्यान देने के लिए बहुत-बहुत आभार आपका। मैं ग़ज़ल में संशोधन कर रहा हूँ..

Comment by Ravi Shukla on November 25, 2015 at 4:14pm
आदरणीय जयनित जी । सुन्दर प्रवाह पूर्ण ग़ज़ल के लिए शेर दर शेर मुबारक बाद क़ुबूल करे । पिया के घर किसी बेटी के जाने से हर और मातम फैल जाने के कथन से विनम्रता पूर्वक मैं असहमत हूँ । पिता अपनी पुत्री को विदा करता है दुखी होना स्वाभाविक है किन्तु उसका एक पुनीत कर्तव्य भी है ये ।इसमें मातम की मौजूदगी थोड़ी असहज लगी । सादर ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आ. भाई सुशील जी , सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर दोहा मुक्तक रचित हुए हैं। हार्दिक बधाई। "
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय अजय गुप्ताअजेय जी, रूपमाला छंद में निबद्ध आपकी रचना का स्वागत है। आपने आम पाठक के लिए विधान…"
Sunday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय जी ।सृजन समृद्ध हुआ…"
Sunday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । आपका संशय और सुझाव उत्तम है । इसके लिए…"
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आयोजन में आपकी दूसरी प्रस्तुति का स्वागत है। हर दोहा आरंभ-अंत की…"
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आपने दोहा मुक्तक के माध्यम से शीर्षक को क्या ही खूब निभाया है ! एक-एक…"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२ **** तीर्थ  जाना  हो  गया  है सैर जब भक्ति का हर भाव जाता तैर जब।१। * देवता…See More
Sunday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"अंत या आरंभ  --------------- ऋषि-मुनि, दरवेश ज्ञानी, कह गए सब संतहो गया आरंभ जिसका, है अटल…"
Saturday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा पंचक  . . . आरम्भ/अंत अंत सदा  आरम्भ का, देता कष्ट  अनेक ।हरती यही विडम्बना ,…"
Saturday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा मुक्तक. . . . . आदि-अन्त के मध्य में, चलती जीवन रेख ।साँसों के अभिलेख को, देख सके तो देख…"
Saturday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"नमस्ते, सुशील जी। आप से मिली सराहना बह्त सुखदायक है। आपका हार्दिक आभार।"
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा एकादश. . . . . पतंग

मकर संक्रांति के अवसर परदोहा एकादश   . . . . पतंगआवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग । बीच पतंगों के…See More
Jan 14

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service