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अतुकांत - आस्तीन मे छुपे सांप ( गिरिराज भंडारी )

आस्तीन मे छुपे सांप

*****************

किसी हद तक सच भी है

आपका कहना

चलो मान लिया

 

आस्तीन मे छुपे सांप

हमारी रक्षा के लिये होते हैं

और हमे काट के या  डस के अभ्यास करते हैं

ताकि हमारा कोई दुश्मन हमपे वार करें

तो ,

हमें ही काट के किया गया अभ्यास काम आये

 

अब सोचिये न

क्या दुशमनी हो सकती है हमारे से ?

उस चूहे की

जो हमारे ही घर मे रह के

हमारे ही अन्न जल मे पलके बड़ा होता है
मोटा होता है

और हमारे ही कपड़ों को कुतर कुतर के

हमें , अकारण नुक्सान पहुँचाता है

कोई दुश्मनी नहीं , है न !

वो तो बस , अपनें दाँत पैने करता है बेचारा

ताकि , हमारे दुश्मनों  के साथ कभी लड़ सके

परास्त कर सके उनको

ये बात और , कि

जब वक़्त आता है सच में

वो अपने बिल मे छुप जाता है

 

फिर भी हमे तो मान ही लेना चाहिये , क्यों भाई साब ?

 

चूहा भी स्वामी भक्त होता है

कुत्तों की तरह ,

 

सच कहते हैं आप  ।

******************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Samar kabeer on November 30, 2015 at 11:18pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी,आदाब,अतुकांत कविता में आपका जवाब नहीं हम पहले ही तस्लीम कर चुके हैं,आपने जिस विषय को छेड़ा है आपके क़लम ने उसे सार्थक कर दिया है,ढेरों दाद के साथ बधाई स्वीकार करें ।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 30, 2015 at 7:48pm

आ० अनुज , आपका पैना चिंतन  प्रभावित करता है , इस विधा पर भी आप की जय हो रही है .

Comment by Ravi Shukla on November 30, 2015 at 1:16pm

आदरणीय गिरिराज जी अतुकांत में आपके भाव शानदार तरीके से सामने आते है धीरे धीरे गिरह खोलते हुए बात को कह जाती है आपकी अतुकांत कविता । छंदो के प्रति आग्रही होने के उपरांत भी इन दिनों कई ऐसी कविताएं आई है पढनें में जो अतुकांत के प्रति हमारी असहिष्‍णुता पर चोट करती चलती है आपकी कविता भी इसी तरह की है सीधे सीधे समझ में आने वाली आदरणीय गोपाल नारायण जी की कबीर पर रचित कविता भी इसी तरह की है । बहुत बहुत बधाई स्‍वीकार करें । सादर

Comment by प्रदीप नील वसिष्ठ on November 29, 2015 at 4:19pm

आदरणीय भंडारी जी आप गजब का व्यंग्य रच सकते हैं।  विधा बदल कर लेख पर आ जाएँ तो बहुत बढ़िया लेख दे पाएँगे , ऐसा मेरा विश्वास है 

Comment by TEJ VEER SINGH on November 28, 2015 at 8:13pm

हार्दिक बधाई आदरणीय गिरिराज भंडारी जी!बेहतरीन व्यंग्य! बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

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