For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

अतुकांत कविता : प्रतिनिधि (गणेश जी बागी)

मैं सड़क हूँ
मुझे तैयार किया गया है
रोड रोलरों से कुचल कर.


मुझे रोज रौंदते हैं 
लाखों वाहन
अक्सर....
विरोध प्रदर्शन का दंश
झेलती हूँ
अपने कलेजे पर
होता रहता हैं
पुतला दहन भी
मेरे ही सीने पर
विपरीत परिस्थितियों में
मैं ही बन जाती हूँ
आश्रय स्थल
कई कई बार तो
प्राकृतिक बुलावे का निपटान भी
हो जाता है
मेरी ही गोद में


फिर भी.....

मैं सहिष्णु हूँ
या
असहिष्णु !
यह तय करते हैं
कथित बुद्धिजीवी.


मैं सड़क हूँ
एक सच्ची प्रतिनधि
इस देश की.

(मौलिक व अप्रकाशित)
पिछला पोस्ट =>लघुकथा : शातिर

Views: 1515

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 18, 2016 at 6:33pm
वास्तविकता को समेटे अद्भुत रचना।हार्दिक बधाई आदरणीय बागी सर।
Comment by LOON KARAN CHHAJER on January 8, 2016 at 6:03pm

फिर भी.....

मैं सहिष्णु हूँ
या
असहिष्णु !
यह तय करते हैं
कथित बुद्धिजीवी.


वाहा।  गणेश जी बहुत मार्मिक। .......

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 4, 2016 at 5:58pm
सम्पूर्ण रचना बार-बार पढ़कर गहराई में उतरने को जी चाहता है....इसी भाव व कथ्य को आपकी लेखनी से उत्कृष्ट लघुकथा में उतरते देखने को जो चाहता है!! इस कृति की तारीफ़ में लफ़्ज़ ढूंढने को जी चाहता है आदरणीय गणेश जी "बागी" जी ।
Comment by vijay nikore on December 16, 2015 at 3:24pm

सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई, आदरणीय गणेश जी।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 5, 2015 at 11:32pm

सड़क एक प्रतीक तो है ही, आपने, गणेशभाई, बिम्बात्मक तौर पर जिस तरह से प्रयुक्त किया है वह आपकी संवेदनशीलता का सटीक उदाहरण है. समसामयिकता कई बार,  विशेषकर नयी कविताओं में, सपाटबयानी के कारण उबाऊ हो जाती है. लेकिन इस रचना में सामयिक तौर पर आम हो चले शब्दों का जिस तरह से उपयोग किया गया है वह प्रासंगिकता को नये आयाम देता है.

समस्त विसंगतियों को झेलती हुई एक सड़क किस तरह से हम-आपके भावनाओं की उद्घोषणा हो जाती है यह पता भी नहीं चलता. लेकिन इन पंक्तियों के सापेक्ष आमजन की मानसिक सीमाओं को करारे ढंग से सामने लाया गया है --

फिर भी.....

मैं सहिष्णु हूँ
या
असहिष्णु !
यह तय करते हैं
कथित बुद्धिजीवी.

एक अरसे बाद आपकी प्रस्तुति आयी है. लेकिन कई शिकायतों का निवारण करती हुई.

हार्दिक शुभकामनाएँ व ढेर सारी बधाइयाँ, गणेश भाई

शुभ-शुभ

 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 5, 2015 at 11:20pm

उत्साहवर्धन और सराहना हेतु हृदय से आभार आदरणीय सुनील जी.

Comment by shree suneel on December 5, 2015 at 8:48pm
आदरणीय गणेश जी, इस सुन्दर, समर्थ अतुकांत कविता के लिए बहुत-बहुत बधाई आपको. सादर.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 5, 2015 at 12:13pm

सराहना हेतु आभार आदरणीय राम आश्रय जी.

Comment by Ram Ashery on December 4, 2015 at 9:30pm

अति उत्तम रचना आपको बहुत बहुत बधाई स्वीकार हो 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 3, 2015 at 2:22pm

आदरणीया राजेश जी, आपकी सराहना कविता को पुरुस्कृत कर गयी, आपने रचना की आत्मा तक जाकर प्रतिक्रिया की है इसके लिए बहुत बहुत आभार.

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Monday
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Monday
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेतुझे याद किया था हमने ... "क्या...तुम्हारे मन के द्वार…See More
Monday
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Sunday
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Jul 24
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
Jul 21

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय अशोक भाईजी, वर्षा ऋतु, विशेषकर सावन मास, के नम क्षणों का रागात्मक वर्णन रोचक बन पड़ा है.…"
Jul 20
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुंदर चौपाइयों की रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
Jul 18
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Jul 14

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service