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नस्री नज़्म :- "आख़री सिगरेट"

ज़िन्दगी को,
अपनी सानवी हैसियत
का अहसास,
शिद्दत से हो रहा है,
लाओ,
ये बची हुई ,
आख़री सिगरेट भी जला लूँ,
ताकि क़िस्सा ख़त्म हो ।

समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

Views: 559

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Comment by Samar kabeer on December 16, 2015 at 10:15pm
जनाब विजय निकोरे जी,आदाब,रचना की सराहना हेतु आपका तहे दिल से आभारी हूँ,बहुत बहुत धन्यवाद ।
Comment by vijay nikore on December 16, 2015 at 2:52pm

छणिका अच्छी लगी। बधाई, आदरणीय समर जी।

Comment by Samar kabeer on December 11, 2015 at 10:45pm
जनाब सौरभ पांडे जी,आदाब,क्षणिका के बारे में मेरी मालूमात सिफ़र है,आपकी तहरीर से ऐसा लगता है कि संक्षिप्त रचना को क्षणिका कहते होंगे ?कृपया क्षणिका के बारे में मुझे जानकारी ज़रूर दें,रचना की सराहना हेतु आपका हृदयतल से आभारी हूँ ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 10, 2015 at 1:32am

इस तरह की प्रस्तुतियों को हिन्दी-साहित्य में ’क्षणिका’ की संज्ञा देने का चलन है.

आपकी प्रस्तुति अत्यंत गहन है. हार्दिकबधाई एवं शुभकामनाएँ, आदरणीय समर कबीर साहब ! 

शुभेच्छाएँ 

Comment by Samar kabeer on December 9, 2015 at 11:32pm
जनाब सुशील सरना जी,आदाब,रचना की सराहना हेतु आपका तहे दिल से आभारी हूँ ।
Comment by Samar kabeer on December 9, 2015 at 11:29pm
जनाब लक्ष्मण धामी जी,आदाब,रचना की सराहना हेतु आपका तहे दिल से आभारी हूँ ।
Comment by Sushil Sarna on December 8, 2015 at 1:01pm

 बहुत खूब आदरणीय   ... गहन भावाभिव्यक्ति के लिए हार्दिक बधाई। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 8, 2015 at 11:09am

बहुत खूब समर भाई जी.....

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