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#गजल#
2212 2212 2212
कटते सिपाही ढ़ह रही कब भीत है?
बस फातिहा पढ़ना यहाँ की रीत है।1

शर्मोहया रख ताक पर ,तूने कहा-
कटते सिपाही,बात तेरी नीत है।2

बगुला बना चलता चकाचक तू हुआ
गाता रहा रे बस पुराना गीत है।3

तू मछलियाँ लपका किया बस बेधड़क
जीता किसीने कह रहा निज जीत है।4

बँटता रहा घर -बार है तेरी दुआ
रे दुखहरण! तुझसे समां भयभीत है।5

हमने जहाँ परसे दही काँटा चुभा,
रे भाल तेरा हो गया अब पीत है।6

है फेंकता खंजर पड़ोसी दूर से
लगता तुझे बैरी बहुत मनमीत है।7

मन का अँधेरा तो मरा अब जा रहा
लगता निशा काली गयी अब बीत है।8

कितना छलेगा अब बता झूठे सनम!
है फट रही कबसे लगी जो प्रीत है।9
मौलिक व अप्रकाशित@

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Comment by Manan Kumar singh on January 9, 2016 at 8:52pm
सादर मान्य
Comment by Manan Kumar singh on January 9, 2016 at 8:51pm
आदरणीय गिरिराज भाई,रवि शुकला जी आभार;आपकी सलाह सदसर मान्य
Comment by Ravi Shukla on January 8, 2016 at 5:05pm

आदरणीय मनन जी गजल के प्रयास के लिये हार्दिक बधाई स्‍वीकार करें । विद्वतजन पहले ही कह चुके है उस पर ध्‍यान देने का निवेदन हमारा भी है


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 7, 2016 at 9:11pm

आदरणीय मनन भाई , अच्छी गज़ल कही है , हार्दिक बधाई आपको । मै भी आ. समर भाई जी की बात से सहमत हूँ, काफिया के लिहाज से  कए शे र खारिज हो रहे हैं , देख लीजियेगा ।

Comment by Manan Kumar singh on January 6, 2016 at 8:16pm
आभार सतविंदर जी।
Comment by Manan Kumar singh on January 6, 2016 at 8:15pm
जनाब समर कबीर जी,गजल को मान देने के लिए आपका शुक्रिया;हाँ अरकान लिख देता हूँ।जहाँ तक काफ़िया की बात है तो वह तो 'अ'रखा गया है,रदीफ़ 'है'है,सादर।
Comment by Samar kabeer on January 6, 2016 at 11:54am
जनाब मनन कुमार जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,आपने ग़ज़ल के अरकान नहीं किखे,जबकि ये मंच का नियम है,इसका ख़याल रखें,क़ाफ़िए भी भटक गए हैं,देखिएगा |
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 6, 2016 at 10:58am
बहुत ख़ूब

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