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मैं राजपथ हूँ [ गणतंत्र दिवस पर ]

मैं राजपथ हूँ 

भारी बूटों की ठक ठक

बच्चों की टोली की लक दक  

 अपने सीने पर महसूसने को 

हूँ फिर से आतुरI

सर्द सुबह को जब 

जोश का सैलाब 

उमड़ता है मेरे आस पास 

सुर ताल में चलती टोलियाँ 

रोंद्ती हैं मेरे सीने को 

कितना आराम पाता हूँ 

सच कहूं ,तभी आती है साँस में साँस

इतराता हूँ अपने आप पर I

पर आज कुछ डरा हुआ हूँ 

भविष्य को लेकर चिंतित भी 

शायद बूढा हो रहा हूँ I

बस मेरी रौनक के इंतज़ार में 

सर्द रात से ठिठुरते बैठे लोग 

कहाँ गए सब ?

हवा में हर तरफ एक 

रस्म निभाने की डरी हुई मजबूरी 

क्यों फ़ैली है ?

मैं राजपथ 

फिर से खिलखिलाना 

और इतराना चाहता हूँ 

नहीं चाहता हूँ बूढा होना 

और डरना तो बिलकुल नहीं 

कब हो सकेगा ऐसा ?

 मौलिक व् अप्रकाशित 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 10, 2016 at 12:05am

आदरणीया प्रतिभाजी, इस प्रस्तुति की गहनता ध्यानाकृष्ट करती है.  हार्दिक बधाई व शुभकामनाएँ 

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 28, 2016 at 12:07am

आदरणीया प्रतिभा जी, आपकी संवेदनशीलता को नमन है. अद्भुत भावुक रचना हुई है जिसके शब्द गहरे तक प्रभावित कर रहे है. आशंकाओं की चिंता और भय को बहुत सधे हुए शब्द मिले है. कविता अपने मर्म तक पाठक को न केवल बहा ले जाती है बल्कि डूब जाने को मजबूर करती है. इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई और धन्यवाद  

Comment by Samar kabeer on January 26, 2016 at 5:54pm
मोहतरमा प्रतिभा पांडे जी आदाब,दिल को छूने वाली इस बहतरीन प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें !
Comment by pratibha pande on January 26, 2016 at 12:01pm

उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार आदरणीय तेजवीर सिंह जी 

Comment by pratibha pande on January 26, 2016 at 11:59am

आपने रचना के मर्म को महसूस किया ,हार्दिक आभार आदरणीय सतविंदर जी 

Comment by pratibha pande on January 26, 2016 at 11:56am

उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार आदरणीया कल्पना जी 

Comment by TEJ VEER SINGH on January 26, 2016 at 10:47am

हार्दिक बधाई आदरणीय प्रतिभा जी!सामयिक और संदेश परक प्रस्तुति!

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 26, 2016 at 7:28am
भावों का अनुपम उद्गार।हार्दिक बधाई आदरणीया प्रतिभा जी।

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