सागर की उठती गिरती लहरें, पथ पर चलना सिखा रही ।
ढूंढती पल पल किनारा, मंज़िल से पहले कभी रुके नहीं ।
सारी व्यथा अपने मन की आपस में एक दूसरे से कहती ।
सागर की गहरी शांति के विरुद्ध रौद्र रूप भरकर बहती ।
ख़तरों से आगाह कराती मंज़िल से पहले कभी रुके नहीं ।
हर काल परिस्थिति में हमको जीवन लक्ष्य बता देती ।
घायल, व्यथित खतरों से खेल, किनारों से दांस्ता कहती ।
संदेशा मानव को देकर कुछ खट्टे मीठे अनुभव कहती ।
आदि से लेकर अंत तक का लेखा जोखा प्रस्तुत करती ।
सागर की उठती गिरती लहरें पथ पर चलना सिखा रही ।
रचना मौलिक एवं अप्रकाशित
Comment
इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई l
बहुत खूब , सुन्दर रचना आ.Ram Ashery जी ,बधाई प्रेषित ! सादर
बहुत सुंदर भाव, बधाई |
आप सभी को मेरी ओर हार्दिक अभिनंदन आभार , मेरी कृति को पढ़ने और मेरे उत्त्साह वर्धन के लिए
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