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वेदना और तृप्ति (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"सही कहा जाता है कि दिन सभी के बदलते हैं।"

"कहाँ से कहाँ-कहाँ पहुँच गए थे! क्या से क्या हो गए थे हम!"

"आख़िर अब साथ साथ यहाँ पहुँच ही गए!"

"कितना सुकून मिलता है यहाँ आकर, सारी हसरतें पूरी हो जाती हैं, है न! "

'रिसेप्शन (प्रीति-भोज)' के शानदार काउन्टरों के चमकते डिशों से वेस्टबिन तक पहुँची जूठनें अब भूखे भिखारियों और बाल-मज़दूरों की क्षुधा शांत कर रहीं थीं।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 5, 2016 at 11:30am
पोस्ट पर उपस्थित हो कर समीक्षात्मक प्रोत्साहक टिप्पणियों के लिए हृदयतल से बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय तस्दीक़ अहमद ख़ान साहब, आदरणीय सतविंदर कुमार जी और मोहतरमा राहिला साहिबा।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 4, 2016 at 9:14pm

 जनाब शेख़ शहज़ाद उस्मानी साहिब ,. अच्छी लघु कथा के लिए मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 4, 2016 at 6:06pm
वाह।बात का आकार छोटा पर घाव करे गम्भीर।बधाई आदरणीय शेख साहब
Comment by Rahila on February 4, 2016 at 11:28am
बहुत दुःखद है ये स्थित जब खाना बड़े पैमाने पर फेंका जाता है । बहुत अच्छा विषय चयन ,सार्थक लेखन है आपका । आदरणीय उस्मानी जी! बहुत बधाई । सादर

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