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दीवानगी एक रोग (लघुकथा)/सतविंदर कुमार

मित्र के घर कि ओर जाना हुआ।घर के दरवाज़े पर दस्तक दी।दरवाज़ा खुला।पर दरवाज़ा खोलने वाले के चेहरे पर अज़ीब सा रूखापन।बहुत ही संक्षिप्त सा अभिवादन।चेहरा ही बहुत कुछ बोल रहा था।मित्र के बेटे का ,जिसने दरवाज़ा खोला ।घर से दूर हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करता है।ऐसा रूखापन उसके चेहरे पर पहले कभी नहीं देखा।वह बहुत हंसमुख और जिंदादिल लड़का है।आज उसकी भावभँगिमा शिकायत सी करती प्रतीत हो रही थी।
उसकी शिक्षा से सम्बन्धी बात हुई।फिर हाल चाल पूछा और अपने मित्र के बारे में पूछा।लड़के ने आश्चचर्य से देखा।उसका ऎसे देखना अचंभित कर गया।
मित्र कागजों और फाइलों को मेज पर फैलाए घर के एक कोने को ऑफिस बनाए काम में मग्न।पर उसकी हरकतें सामान्य नहीं थी।उसे टोका तो भी सही उत्तर न मिला।मन खिन्न हुआ।लड़के से पूछा,"अरे भई! इतना भी क्या काम कि छुट्टी के दिन भी ये हाल?न अपनी फ़िक्र न ही अपने किसी अज़ीज़ की?"
"ये ऑफिस नहीं जाते।"
लड़के ने रुंधे कण्ठ से कहा।
"मतलब? फिर ये काम क्यों?"
हैरत से पूछा।
"दीवानगी है।"
"ऐसा क्यों?"
"काम से प्यार,ईमानदारी और सहकर्मी दोस्तों द्वारा असीम सहयोग...?"
वह बोलते-बोलते फफक पड़ा।
मन दुःखी था और मस्तिष्क उसकी बात के मायने जानने की कोशिश कर रहा था।

मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 22, 2016 at 3:16pm
बहुत बहुत हार्दिक आभार आदरणीया राहिला जी, स्नेहिल प्रोत्साहन के लिए।।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 15, 2016 at 7:16am
बहुत बहुत हार्दिक आभार आदरणीय शेख शहज़ाद जी।नमन
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 15, 2016 at 7:15am
स्नेहिल प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार आदरणीय तेजवीर जी।नमन
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 14, 2016 at 8:18pm
बेहद भावपूर्ण विचारणीय संदेश वाहक प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत हार्दिक बधाई आपको आदरणीय सतविंदर कुमार जी।
Comment by TEJ VEER SINGH on February 14, 2016 at 5:37pm

हार्दिक बधाई आदरणीय सतविंदर जी!बेहतरीन प्रस्तुति!

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