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तुम्हे जीतने की अदा चाहती हूँ (ग़ज़ल)...... //डॉ. प्राची

122 122 122 122

कहो तो बता दूँ कि क्या चाहती हूँ।
तुम्हारे लिए हर दुआ चाहती हूँ।

दबी सी रही ज़िन्दगी नीँव जैसी
कि अब आसमां में उठा चाहती हूँ।

निभाओ मेरा साथ या छोड़ जाओ
कहाँ तुमको खुद से बँधा चाहती हूँ।

ज़ुबाँ से मुकरना कोई तुमसे सीखे
मैं सब कागजों पर लिखा चाहती हूँ।

न दिल पर तुम्हारे कोई बोझ आए
कहाँ एक भी वायदा चाहती हूँ।

गँवाया बहुत कुछ तेरी राह चल कर
दुबारा सभी कुछ मिला चाहती हूँ।

सज़ा बिन किये जिन खताओं की पाई
करूँ आज हर वो खता चाहती हूँ।

हुनर है सँजोना ये रिश्तों की पूँजी
बुज़ुर्गों से ये सीखना चाहती हूँ।

पता है मुझे तुम गज़ब पारखी हो
तुम्हें जीतने की अदा चाहती हूँ।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Madan Mohan saxena on February 25, 2016 at 5:34pm

हुनर है सँजोना ये रिश्तों की पूँजी
बुज़ुर्गों से ये सीखना चाहती हूँ।

पता है मुझे तुम गज़ब पारखी हो
तुम्हें जीतने की अदा चाहती हूँ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 25, 2016 at 3:55pm

आदरणीय नादिर खान जी 

जिस शेर को आपने इंगित किया है, वो चर्चा चाहता है...

मंच पर एक तरही मुशायरा इस ज़मीन पर हो चुका है , उसकी संकलित गजलों में इस तरह के प्रयोग स्वीकार्य देखे.. हालांकि मैं भी मिसरा-ए-सानी की प्रस्तुति से व्याकरणिक तौर पर असहज हूँ, लेकिन इस मिसरे पर चर्चा हो इसी लिए इस 'मिला' वाले शेर को साथ ही 'उठा' वाले शेर को मंच पर प्रस्तुत किया.

संकलन का लिंक प्रस्तुत है :

http://www.openbooksonline.com/forum/topics/59

संशय का निवारण जानकार अवश्य करेंगे..ऐसा विश्वास है.

Comment by annapurna bajpai on February 25, 2016 at 12:18pm


हुनर है सँजोना ये रिश्तों की पूँजी
बुज़ुर्गों से ये सीखना चाहती हूँ।.........................वाह , क्या खूब गजल , बहुत बहुत बधाई आपको आ0 प्राची जी । 

Comment by जयनित कुमार मेहता on February 25, 2016 at 8:03am
आदरणीय प्राची जी, हार्दिक बधाई आपको इस सुन्दर रचना के लिए..

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 24, 2016 at 4:44pm

सज़ा बिन किये जिन खताओं की पाई
करूँ आज हर वो खता चाहती हूँ।

हुनर है सँजोना ये रिश्तों की पूँजी
बुज़ुर्गों से ये सीखना चाहती हूँ।    -- आरदरणीया प्राची जी , गज़ल के लिये और इन्दो अशआर के लिये आपको हार्दिक बधाई , बहुत सुन्दर गज़ल हुई है ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 24, 2016 at 11:35am

आ० प्राची बहन सुनदार ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई l

Comment by नादिर ख़ान on February 23, 2016 at 11:23pm

हुनर है सँजोना ये रिश्तों की पूँजी
बुज़ुर्गों से ये सीखना चाहती हूँ।

पता है मुझे तुम गज़ब पारखी हो
तुम्हें जीतने की अदा चाहती हूँ।... अच्छे अशआर हुये है अदरणीया, बधाई स्वीकारें ...

दुबारा सभी कुछ मिला चाहती हूँ।? इसपर पुनः विचार करें 

सादर ....

Comment by kanta roy on February 23, 2016 at 10:39pm
पता है मुझे तुम गज़ब पारखी हो
तुम्हें जीतने की अदा चाहती हूँ।---- वाह ! क्या अदा चाहती है ! क्या कहूँ , आपको पढने का एक अलग ही मजा आता है मंच पर । एक अलग ही मिजाज़ की लेखनी होती है सदा । यह गजल भी बडी़ ही खूबसूरत बन पडीं है । बधाई " कबूलियेगा " आदरणीया प्राची जी । :))))

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