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गज़ल............उसी से दिल्लगी...

बहरे रुक्न.....हज़ज़ मुसम्मन सालिग

दिखा कर रोशनी जिसने किया है सृष्टि को पावन.

सघन तम में बसी जिसने किया है सृष्टि को पावन.

रही चर्चा यही जिसने किया है सृष्टि को पावन.

नहीं मिलती फली जिसने किया है सृष्टि को पावन.

हवाओं में, गुबारों में, समन्दर में वही साया

कहे मुझको परी जिसने किया है सृष्टि को पावन.

दिवाकर सांझ से मिलकर सितारे रात से कहते

वही सबसे बली जिसने किया है सृष्टि को पावन.

करें मत सृष्टि से रगड़ा रखें बस दृष्टि समता की

कयामत सौंपती जिसने किया है सृष्टि को पावन.

वही साकी, वही प्याला, वही मदमस्त हाला है

उसी से दिल्लगी जिसने किया है सृष्टि को पावन.

हकीकत को समझ सत्यम बहुत मुश्किल नहीं कोई

सिखाती सादगी जिसने किया है सृष्टि को पावन.

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 7, 2016 at 7:11am

आ०  वामनकर भाई जी, सादर प्रणाम!  आपका बहुत-बहुत हार्दिक आभार, सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 7, 2016 at 12:13am

आदरणीय केवल प्रसाद जी, बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने. हार्दिक बधाई 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 5, 2016 at 7:21pm

आ० समर साहब जी  आदाब,  इस तारीफ के लिये आपका तहेदिल से बहुत-बहुत शुक्रिया. सादर

Comment by Samar kabeer on March 4, 2016 at 9:48pm
जनाब केवल प्रसाद जी आदाब,वाह बहुत ख़ूब कामयाब ग़ज़ल कही आपने,तवील रदीफ़ में बहुत अच्छे अशआर निकाले आपने,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ।
Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 4, 2016 at 7:53pm

आ०  श्याम नरायण भाई जी, सादर प्रणाम!  आपका हार्दिक आभार, सादर

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 4, 2016 at 7:52pm

आ० कांता जी, सादर प्रणाम!  आपका हार्दिक आभार, सादर

Comment by Shyam Narain Verma on March 4, 2016 at 5:59pm
बहुत खूब , हार्दिक बधाई । सादर
Comment by kanta roy on March 4, 2016 at 10:07am
वही साकी, वही प्याला, वही मदमस्त हाला है
उसी से दिल्लगी जिसने किया है सृष्टि को पावन...... वाह ! बहुत खूब कही है आपने आदरणीय केवल प्रसाद जी । बधाई स्वीकार करें ।

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