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जब से पिया गए परदेस ...


जब से पिया गए परदेस ...

प्रेम हीन अब
इस जीवन में
कुछ भी नहीं है शेष
जब से पिया गए परदेस//

नयन घट
सब सूख गए
बिखरे घन से केश
जब से पिया गए परदेस//

दर्पण सूना
हुआ शृंगार से
सूना हिया का देस
जब से पिया गए परदेस//

लगे दंश से
बीते मधुपल
दीप जलें अशेष
जब से पिया गए परदेस//

बिरहन का तो
हर पल सूना
रहे अश्रु न शेष
जब से पिया गए परदेस//

क्षणिक संचय
प्रेम क्षणों का
बना श्वासों का देस
जब से पिया गए प्रदेश//

स्मृति अमृत
वो निस्सीम नेह का
बना जीवन सुधा विशेष
जब से पिया गए परदेस//


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on May 6, 2016 at 2:19pm

आदरणीय रामबली गुप्ता जी प्रस्तुति में निहित भावों को आपकी आत्मीय प्रशंसा ने जो मान दिया है उसके लिए आपके तहे दिल से शुक्रिया। 

Comment by रामबली गुप्ता on May 6, 2016 at 4:54am
क्या बात है आदरणीय सुशील सरना जी जबरदस्त प्रस्तुति। आनंद आ गया सच में।
Comment by Sushil Sarna on May 5, 2016 at 7:31pm

आदरणीय डॉ. गोपाल नारायन  श्रीवास्तव जी प्रस्तुति में निहित भावों को मान देने का दिल से आभार। 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 5, 2016 at 4:12pm
सुन्दर रचना आदरणीय सरना जी .
Comment by Sushil Sarna on May 4, 2016 at 7:18pm

आदरणीया   KALPANA BHATT    जी प्रस्तुति पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 4, 2016 at 2:44pm

वाह | बेहद सुंदर रचना | बधाई स्वीकारें आदरणीय सुनील सरना सर | 

Comment by Sushil Sarna on May 3, 2016 at 5:55pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी प्रत्युत्तर के लिए हार्दिक आभार। सर इसका ज्ञान तो है मुझे पर इस पर एडिटिंग करते ही पोस्ट पुनः लाइन में लग जाती है। शायद कमेंट्स भी डिलीट हो जाते हैं इसीलिये मैंने ये बात कही थी। फिर भी सुझाव के लिए हार्दिक आभार। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 3, 2016 at 5:16pm

आदरणीय सुशील सरना सर, मेरे कहे को मान देने के लिए हार्दिक आभार.  पटल पर एडिटिंग संभव है बस आप इसी पृष्ठ पर ऊपर दिख रहे आप्शन को क्लिक कीजिये एडिटिंग के लिए आप्शन आ जायेगा -

Comment by Sushil Sarna on May 3, 2016 at 5:01pm

आदरणीय तेजवीर  सिंह जी रचना को आत्मीय मान देने का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on May 3, 2016 at 5:00pm

आदरणीय मिथिलेश वमनकर जी प्रस्तुति में निहित भावों को इतना मान देने के लिए आपके दिल की असीम गहराईयों से हार्दिक आभार। आपके द्वारा रचना का संशोधित रूप भी मन को बहुत भाया। पटल पर तो एडिटिंग संभव नहीं लेकिन मैं इसे अपने  मूल सृजन में अवशय अपनाऊंगा। आपकी इस नेह का दिल से आभार सर। 

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