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क्षितिज

यह कौन है वहां उस छोर पर
जो देख रहा बादलों के कोर से
बैठ गया है जो वहां सालों से
न वो कोई ज़मीन पर रहता है
न ही आसमान को कोई हिस्सा है
दिखता है वो बहुत करीब मगर
जाने किस जहां में बस्ता है
दूर है वो पर करीब ही दिखता है
जब पूछते है पता उसका
कुछ मुस्कुराकर वो यह कहता है
बांवरा मन यह तेरा क्यों मुझको
इस बेचैनी से क्यों मुझको तू देखता है
क्षितिज हूँ मैं ,
आसमान का नहीं ,ज़मीन का भी नहीं
यह मेरा जहां है जहाँ तू मुझको देखता है |


मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by मिथिलेश वामनकर on May 11, 2016 at 1:31pm

आदरणीया कल्पना जी, बहुत बढ़िया प्रस्तुति है. हार्दिक बधाई. निवेदन है इन पंक्तियों को एक बार और देख लीजियेगा-

//न ही आसमान को कोई हिस्सा है 

जाने किस जहां में बस्ता है //

सादर 

Comment by narendrasinh chauhan on May 10, 2016 at 3:56pm

बेहद उम्दा रचना ! लाजवाब 

Comment by Sushil Sarna on May 9, 2016 at 7:53pm

क्षितिज हूँ मैं ,
आसमान का नहीं ,ज़मीन का भी नहीं
यह मेरा जहां है जहाँ तू मुझको देखता है |

बहुत खूबसूरत अहसास की प्रस्तुति हुई है आदरणीया कल्पना भट्ट जी। हार्दिक बधाई।

Comment by रामबली गुप्ता on May 9, 2016 at 6:09pm
बहुत ही सुंदर रचना आदरेया कल्पना भट्ट जी
Comment by Samar kabeer on May 9, 2016 at 6:06pm
मोहतरमा कल्पना भट्ट साहिबा आदाब,बहुत ख़ूब वाह, इस सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।

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