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इतिहास गवाह है(लघुकथा )राहिला

एक बड़े ही अनुकूल सर्व सुविधा युक्त घूरे पर बर्षों से घरेलू मक्खियों की पीढ़ियां मजे से जिंदगी बसर कर रही थीं। ऐसे में ना जाने कौन साफ तबियत वाले ने नगर पालिका को घूरा हटाने का आवेदन दे मारा । इसकी खबर जैसे ही मख्खियों को लगी, उनमें खलबली मच गई । उन्हें इतना व्यथित देख,एक बूढ़ी सियानी मक्खी ने सांत्वना दी ।
"अरे इतना क्यूं घबरा रही हो? इतिहास गवाह है, आजतक हमें कोई नहीं मिटा पाया । "
"लेकिन दादी मख्खी! अगर नगर पालिका वाले सचमुच आ गये तो,हम बच्चों को लेकर कहाँ जायेंगे? "
"कहीं नहीं, अब्वल तो वो निकम्में एक बार में आते नहीं, फिर अगर आ मरे भी,तो ये आसपास के इंसान तो नहीं मरे ना !"

.
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Tanuja Upreti on June 5, 2016 at 6:14pm
बहुत बढ़िया लघुकथा, हार्दिक बधाई
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on June 5, 2016 at 3:55pm
बहुत उम्दा धारदार सम्प्रेषण। सादर हार्दिक बधाई आपको आदरणीया राहिला जी।
Comment by Janki wahie on June 5, 2016 at 2:57pm
बहुत गहरी पकड़ प्रिय राहिला । इतनी सार्थक कथा के लिए हार्दिक बधाई।

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