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फूल जंगल में खिले किन के लिए (तरही ग़ज़ल 'राज ')

२१२२  २१२२  २१२

ढाल बन अकड़ा रहा जिनके लिए

जगमगाये दीप कुछ दिन के लिए

 

घोंसला भी साथ उनके उड़ गया

रह गया वो हाथ में तिनके लिए

 

फूल को तो ले गई पछुआ  हवा  

रह गई बस डाल मालिन के लिए

 

फूल चुनकर बांटता उनको रहा

खुद कि खातिर ख़ार गिन गिन के लिए

 

क्या मिला उसको बता ऐ जिन्दगी

सोचकर उनके लिए इनके लिए

 

अपने आंगन में खिले अपने नहीं

फूल जंगल में खिले किन के लिए

 

पत्थरों के शह्र में पत्थर सभी     

हैं कहाँ जज्बात मोहसिन के लिए

 

रू परिंदा एक  दिन उड़ जायेगी  

बस कफ़स में कैद पल छिन के लिए 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 9, 2016 at 7:39am

बहुत- बहुत शुक्रिया आ० सौरभ जी .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 9, 2016 at 7:38am

आ० सुशील सरना जी,आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सफल हुआ आपका तहे दिल से बहुत- बहुत शुक्रिया | 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 8, 2016 at 11:38pm

चलिये न तब अभी ही सही .. :-)) 

स्वस्थ हो गयी आदरणीया, ये जान कर प्रसन्नता हुई.. 

सादर

Comment by Sushil Sarna on June 8, 2016 at 8:02pm

ढाल बन अकड़ा रहा जिनके लिए
जगमगाये दीप कुछ दिन के लिए

घोंसला भी साथ उनके उड़ गया
रह गया वो हाथ में तिनके लिए

दिलकश अंदाज़ में सृजित अशआर दिल पर असर करते हैं आदरणीया राजेश कुमारी जी। इस भावनापूर्ण ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 8, 2016 at 1:26pm

आ० गिरिराज जी ,ग़ज़ल पर शिरकत और सुखन नवाजी का तहे दिल से शुक्रिया आपके मशविरे का स्वागत है 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 8, 2016 at 12:38pm

आदरनीया राजेश ज्जी , बेहतरीन गज़ल कही आपने , गिरह भी अच्छी लगाई है , दिली मुबारक बाद आपको ।

क्या मिला उसको बता ऐ जिन्दगी

सोचकर उनके लिए इनके लिए      -- गलत कुछ भी नही पर , प्रश्न अगर ज़िंदगी से हो तो और अच्छा  -- ऐसे कह के देखिये

क्या मिला तुझको बता ऐ जिन्दगी

सोचकर उनके लिए इनके लिए  ---  परिवर्तन ज़रूरी नही है बस एक सलाह है ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 8, 2016 at 11:57am

आ० रवि शुक्ल जी ,ग़ज़ल पर आपकी दाद और मेरे स्वास्थ्य के प्रति शुभकामनाओं के लिए तहे दिल से आभार |

Comment by Ravi Shukla on June 8, 2016 at 11:28am

आदरणीया राजेश जी आपकी तरही गजल पढी अच्‍छी लगी बहुत बहुत बधाई आपको आप अब स्‍वस्‍थ है ये जान कर संतोष हुआ पुन: सक्रिय होना  शुभ लक्षण है  । सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 8, 2016 at 8:58am

प्रिय प्रतिभा जी , आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सफल हुआ आयोजन में उपस्थित न हो पाने की टीस तो रहती ही है किन्तु अब भी संतुष्टि मिल रही है ग़ज़ल तक आने और अपनी सुन्दर प्रतिक्रिया  से  नवाज़ने पर आपका तहे दिल से आभार |

Comment by pratibha pande on June 8, 2016 at 8:26am

 मुशायरे में शरीक न हो पाने की कमी आपने पूरी कर ही दी इस लाजवाब प्रस्तुति से आदरणीया राजेश कुमारी जी , ढेरों दाद लीजिये इस ग़ज़ल पर आप 

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