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गजल(धूप का मंजर बला था)

2122 2122

धूप का मंजर बला था
साथ पर साया चला था।1

आज जितना तब कहाँ यह
छाँव का आलम खला था।2

सच कहा है घर हमेशा
खुद चिरागों से जला था।3

क्यूँ मिटाने पर तुले अब
बच गया जो अधजला था।4

बातियों का नेह बहकर
हो गया तब जलजला था!5

स्वेद सिंचित हो गयी भू
पेड़ तब कोई पला था।6

रंग सबके मिल गये थे
इक तिरंगा तब फला था।7

रश्मियों के प्रेम-रस पग
जड़ हिमालय भी गला था।8

कट रहे हम हैं परस्पर
कट गया जो वह भला था।9
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

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Comment

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Comment by Manan Kumar singh on June 30, 2016 at 10:36pm
आभार आदरणीय राज भाई।
Comment by कवि - राज बुन्दॆली on June 30, 2016 at 4:31pm

आदरणीय मनन भाई , ग़ज़ल बहुत अच्छी है आपकी , हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by Manan Kumar singh on June 20, 2016 at 8:35pm
आभार आपका आदरणीय गिरिराज भाई,देखता हूँ।आपका स्नेहपूर्ण टीकाकरण मेरा संबल है।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 20, 2016 at 2:32pm

आदरणीय मनन भाई , ग़ज़ल अच्छी लगी आपकी , हार्दिक बधाइयाँ ।

बातियों में नेह बचकर
बन गया वह जलजला था ----   यह शे र या तो मै समझ नही पाया या आप बात ठीक से कह नही पाये , देखियेगा ।

Comment by Manan Kumar singh on June 20, 2016 at 9:08am
आभार
Comment by मनोज अहसास on June 19, 2016 at 7:18am
बहुत खूब
बधाई
सादर

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