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गजल(दीप बन जलता रहा हूँ.....)

दीप बन जलता रहा हूँ रात-दिन
रोशनी बिखरा रहा हूँ रात-दिन।1

जब अचल मन का पिघलता है कभी
नेह बन झरता रहा हूँ रात-दिन।2

फिर उबलता है समद निज आग से
मेह बन पड़ता रहा हूँ रात-दिन।3

कामनाएँ जब कुपित होकर चलीं
देह बन ढ़हता रहा हूँ रात-दिन।4

व्योम तक विस्तार का कैसा सपन!
मैं 'मनन' करता रहा हूँ रात-दिन।5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

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Comment by Manan Kumar singh on June 30, 2016 at 10:35pm
शुक्रिया जनाब आपका।
Comment by कवि - राज बुन्दॆली on June 30, 2016 at 4:29pm

वाह क्या कहने है जनाब,,,,,्दिल से मुबारकबाद

Comment by Manan Kumar singh on June 22, 2016 at 11:25am
आभार आदरणीय गिरिराज भाई!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 22, 2016 at 9:51am

आदरणीय मनन भाई , ग़ज़ल बहुत अच्छी हुई है , दिल से बधाइयाँ ।

वैसे काफिया - जलता और करता मे इता दोष है , ये सही है ।

Comment by Manan Kumar singh on June 21, 2016 at 12:26pm
आभार आ. आशुतोष जी,देखता हूँ।
Comment by Manan Kumar singh on June 21, 2016 at 12:25pm
आभार आ.सूरज जी।
Comment by Manan Kumar singh on June 21, 2016 at 9:44am
आभार आपका नीलेश जी
Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 21, 2016 at 8:27am
इस रचना के लिए हार्दिव बधायी स्वीकार करें भाई मनन जी आदरनीय नूर जी का मश्विरा सही है सादर
Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on June 20, 2016 at 10:09pm
एक ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है मनन जी
बहुत ही उमदा फ़िक्र है आप के शेरों में
दाद क़ुबूल हो
Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 20, 2016 at 10:04pm

जलता और करता ,,काफिये में ईता दोष है आ. राजेश दीदी दे कैसे चूक गया.?

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