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हिचकियाँ उसको न आयें डर रहा था

२१२२        २१२२      २१२२

याद उसको आज जब मैं कर रहा था

हिचकियाँ उसको न आयें डर रहा था

 

जिस जगह पर हुक्मरानों का महल है

हम गरीबो का वहाँ कल घर रहा था

 

जिस ग़ज़ल के दाम लाखों में लगे थे

उसका शाइर आज भूखा मर रहा था

 

वो सियासत दार कैसे मिलता तुमसे

रात दिन बस वो खजाने भर रहा था

 

वक़्त था अंतिम मगर वो झूठ बोले

वो हकीकत में कहाँ फिर मर रहा था

 

भेष को अपने बदलकर राम जैसे

रोज सीताओं को रावण हर रहा था

 

ढो रहे थे ईंट रोड़े आज घोड़े

घास गदहों का कबीला चर रहा था

 

ये जमी जोरू लड़ाई का सबब है

पर सबब सबसे बड़ा बस जर रहा था

 

तिश्नगी आँखों में उसकी ढूंढें आशू

जो सरापा जाम से ही तर रहा था

मौलिक व अप्रकाशित 

F-30

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 26, 2016 at 8:47pm

जिस जगह पर हुक्मरानों का महल है

हम गरीबो का वहाँ कल घर रहा था   -- लाजवाब ! आदरणीय आशुतोष भाई , बहुत अच्छी ग़ज़ल कही , दिल से बधाइयाँ आपको ।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on June 26, 2016 at 9:20am
भेष को अपने बदलकर राम जैसे
रोज सीताओं को रावण हर रहा था.....बहुत ख़ूब

ढो रहे थे ईंट रोड़े आज घोड़े
घास गदहों का कबीला चर रहा था.....वाह्ह !
बेहतरीन कटाक्ष!हार्दिक बधाई आदरणीय
Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 25, 2016 at 3:04pm

आदरणीय महेंद्र जी रचना पर आपकी प्रतिक्रियाके लिए हार्दिक धन्यवाद सादर 

Comment by Mahendra Kumar on June 25, 2016 at 2:08pm
बेहद उम्दा ग़ज़ल आदरणीय आशुतोष जी! हार्दिक बधाई!
Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 25, 2016 at 2:02pm

आदरणीय श्याम जी आपका प्रोत्साहन मुझे सतत मिलता है ..रचना पर आपकी सकारत्म प्रतिक्रिया से मुझे हौसला मिला है सादर धन्यवाद के साथ 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 25, 2016 at 2:01pm

आदरणीय हर्ष जी रचना पर आपकी प्रतिक्रिया से मुझे उर्जा मिली है ..तहे दिल धन्यवाद स्वीकार करें सादर 

Comment by Shyam Narain Verma on June 25, 2016 at 12:59pm

जिस ग़ज़ल के दाम लाखों में लगे थे

उसका शाइर आज भूखा मर रहा था

इस लाजवाब, उम्दा ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई  सादर ।
Comment by Harash Mahajan on June 25, 2016 at 12:42pm

बहुत ही उम्दा आशुतोष मिश्र जी ...
"

जिस ग़ज़ल के दाम लाखों में लगे थे

उसका शाइर आज भूखा मर रहा था"

अच्छी पेशकश आ० आशुतोष जी !!..सभी शेर अच्छे रहे...दाद कबूल कीजियेगा !!

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