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माँ
=====
जननी से सबको मिला,जीवन ये अनमोल
कर्ज चुका सकते नहीं,यही समय के बोल।।

माँ ममता की मूर्ति बन,दे बच्चों को प्यार
सुख-सुविधा सब हर्ष से,उनपे देती वार।।

भोलेपन का माँ सही,करती है उपचार
प्रथम ज्ञान से सौंपती,उन्नत सोच-विचार।।

पहला शिक्षक मात ही,दे सन्तों सम ज्ञान
उठना,चलना ,बोलना,रिश्ते हैं सोपान।

बोल-चाल की सीख को,माँ से लेते जान
लेकर जग में जो चलें,उनको मिलता मान।।

जननी सबकी माँ सही,जन्मभूमि भी मात
इन दोनों के ही लिए,ध्यान धरो हे तात।।

=======

मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on June 26, 2016 at 11:02am
आदरणीय Ashok Kumar Raktale जी प्रोत्साहन एवम् मार्गदर्शन के लिए बहुत-बहुत आभार।आपके सुझावानुरूप ठीक करने का प्रयास करूँगा।सादर
Comment by Ashok Kumar Raktale on June 26, 2016 at 10:49am

आदरणीय सतविन्द्र कुमार जी सादर, सुंदर दोहे. बहुत-बहुत बधाई.दोहे मात्रिक और गेयता के आधार पर अच्छे रचे हैं किन्तु कुछ शब्दों के उपयोग में सावधानी बरती जाने की आवश्यकता है.

माँ ममता की मूर्त है  यहाँ 'मूर्ति ' शब्द होना चाहिए. वहीँ इस दोहे में "पीना-खान" और चौथे दोहे में "सन्तन" शब्द को बदलने पर विचार करें.

"लेकर समाज में चलें" इस चरण को // लेकर चलें समाज में // कहना अधिक गेय होगा. सादर.

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on June 26, 2016 at 9:59am
प्रयास का अनुमोदन कर प्रोत्साहित करने के लिए सादर हार्दिक आभार आदरणीय विजय शंकर जी।
Comment by Dr. Vijai Shanker on June 26, 2016 at 9:54am
भोलेपन का माँ सही,करती है उपचार
ज्ञान-प्रथम है सौंपती,उन्नत सोच-विचार।।
जननी और जन्म भूमि को समर्पित दोहों के लिए बधाई, आदरणीय सतविंदर कुमार , जी सादर।

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