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बढ़ता जीवन,घटती ताकत(कुण्डलिया)/सतविन्द्र कुमार

जीवन का यह खेल है,जो चलता दिन रैन
समझे जो इस बात को,वह पाता है चैन
वह पाता है चैन,कभी फिर दुःख ना पाए
मस्ती में ले काट,समय जैसा मिल जाए
सतविंदर कह बात,वही जो हो सच्ची जी
कटते जब दिन -रात,चले ताकत घटती जी।।


मौलिक एवम् अप्रकाशित।

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 22, 2016 at 4:56pm
आभार सँग नमन आदरणीय विजय निकोरे सर।
Comment by vijay nikore on August 22, 2016 at 4:11pm

सुन्दर छंद के लिए बधाई, सतविन्द्र जी

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on July 17, 2016 at 12:15pm
आदरणीय अशोक कुमार रक्ताले जी,सादर प्रोत्साहन के लिए कोटिशः आभार।इस छंद से सम्बंधित समग्र ज्ञान हो जाए इसी अपेक्षा से यह यूँ लिखा है।इसको सही सीखने के लिए आप सब सुधिजनों की समीक्षात्मक टिप्पणियाँ सहृदय अपेक्षित हैं।सादर नमन
Comment by Ashok Kumar Raktale on July 17, 2016 at 10:14am

वाह ! वाह ! आदरणीय सतविन्द्र कुमार जी बहुत सुंदर कुण्डलिया छंद रचा है. बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें. शब्दांश से अंत में कोई बुराई नहीं है, किन्तु जब छंद एक चतुश्कल से प्रारम्भ हो रहा है तो अंत भी उस शब्द से करना श्रेष्ठ होता. जब छंद किसी त्रिकल से प्रारम्भ किया गया हो तब शब्दांश का प्रयोग उचित जान पड़ता. सादर.

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on July 17, 2016 at 7:25am
आदरणीय समर कबीर जी आपको कुण्डलियाँ अच्छी लगी।उसके लिए बहुत बहुत आभार।नमन
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on July 17, 2016 at 7:23am
आदरणीय रामबली जी पहले हम भी यही समझते थे।श्रद्धेय सौरभ पाण्डेय जी ने मई में छंदोत्सव में ऐसा ही कुण्डलियाँ छंद पेश किया था बाद में उस पर चर्चा हुई थी। तब उन्होंने अनेक ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए थे जिनमें ऐसे शब्दांश ही अंत में फिट किए गए हैं।श्रद्धेय सौरभ सर न माननीय प्रधान सम्पादक पूज्य श्री योगराज प्रभाकर जी जिज्ञासा पर यह विधान विस्तृत रूप से बताया था।यदि यह कुण्डलियाँ छंद विधान अनुरूप न होता तो प्रधान सम्पादक जी द्वारा ख़ारिज कर दिया गया होता।क्योंकि प्रारम्भ में मुझे कारण बताते हुए ऐसा किया जा चुका है।सादर
Comment by रामबली गुप्ता on July 17, 2016 at 5:38am
आद0 सतविंदर जी बताना चाहूँगा *जी* शब्दांश है शब्द नही। कुण्डलिया जिस शब्द या शब्द-समूह से शुरू होता है उसी पर समाप्त होता है।सादर
Comment by Samar kabeer on July 16, 2016 at 10:36pm
जनाब सतविंदर कुमार जी आदाब,में इस विधा को नहीं जनता,मगर अच्छी लगी,बधाई स्वीकार करें ।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on July 16, 2016 at 3:58pm
जी से शुरू जी पर खत्म हुई। प्रोत्साहन के लिए आभार आदरणीय राम बली जी
Comment by रामबली गुप्ता on July 16, 2016 at 12:50pm
सतविंदर जी सुंदर प्रयास है किन्तु कुण्डलिया जिस शब्द से शुरू होता है उसी पर समाप्त होता है।

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