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गजल(आहटों से डर रहा....)

2122 2122 212
आहटों से डर रहा वह अाजकल
चाहतों का बस हुआ वह आजकल।1

फूल को समझा रहा है असलियत
सुरभियों को डँस रहा वह अाजकल।2

शब्द मय चुभते नुकीले दुर्ग में
राह भूला,है फँसा वह अाजकल।3

बात की गहराइयाँ समझे बिना
तंज बेढब कस खड़ा वह आजकल।4

रोशनी की चाह में खुद को भुला
हो गया है अलबला वह अाजकल।5

आदमी लगता कभी सुलझा हुआ
फिर लगा खुद ही ठगा वह अाजकल।6

चादरें हैं श्वेत सबको क्या पता
काजलों में है रँगा वह अाजकल।7

नींद में चलता हुआ लगता मुआ
लाख हो पर कब जगा वह अाजकल।8

मलहमों से घाव कुछ भरता नहीं
रंजिशों का है घड़ा वह आजकल।9
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

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Comment

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Comment by Manan Kumar singh on July 2, 2016 at 9:11am
आभार आपका गिरिराज भाई, देखता हूँ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 2, 2016 at 8:36am

आदरणीय मनन भाई , अच्छी गज़ल कही है , हार्दिक बधाइयाँ । एक  '' है '' की कमी मिसरों मे लगती है , देखियेगा ।

शब्द मय चुभते नुकीले दुर्ग में
राह भूला फँस चला वह अाजकल।    -- राह भूले , हैं फँसा वह आजकल   --- बात कुछ साफ आयेगी

ऐसे ही कुछ सुधार की संभावनाये मिसरों मे हैं  अभी - सोच लीजियेगा

 

Comment by Manan Kumar singh on July 1, 2016 at 11:11pm
बहुत बहुत आभार आदरणीया।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 1, 2016 at 8:37pm

चादरें हैं श्वेत सबको क्या पता
काजलों में है रँगा वह अाजकल।7

बहुत खूब आदरणीय | 

Comment by Manan Kumar singh on July 1, 2016 at 8:32pm
आभार नीलेश जी आपका।
Comment by Manan Kumar singh on July 1, 2016 at 8:31pm
आभार आदरणीय सुशील जी।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on July 1, 2016 at 7:42pm

अच्छा प्रयास है .. अमूमन एक "है" की कमी खल रही है .. 
मसलन 
.
आहटों से डर रहा है अाजकल
चाहतों का हो गया है आजकल
.
फूल को समझा रहा है असलियत
सुरभियों को डँस रहा है अाजकल।

Comment by Sushil Sarna on July 1, 2016 at 3:11pm

आहटों से डर रहा वह अाजकल
चाहतों का बस हुआ वह आजकल।1

फूल को समझा रहा है असलियत
सुरभियों को डँस रहा वह अाजकल।2

वाह अादरणीय मनन कुमार जी खूबसूरत अहसासों की इस दिलकश ग़ज़ल के लिए दिल से बधाई स्वीकार करें।

कृपया ध्यान दे...

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