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बंटवारा--

जैसे ही वो भिखारी उनके दरवाज़े पर पहुंचा और आवाज़ लगायी "भगवान के नाम पर कुछ दे दो बाबा", पंडितजी ने डपट कर कहा "यहाँ क्यों आये माँगने, वहीँ से ले लिया करो"|
भिखारी ऐसी झिड़कियों का आदी था, कुछ देर सोच में पड़ा रहा फिर बोल "हम तो मांग के खाने वाले हैं, जहाँ मिल जाए, ले लेते हैं"|
"फिर भी, सोचते नहीं हो कि कहाँ माँगना है और कहाँ नहीं", कहते हुए पंडितजी की नज़र किनारे वाले घर की ओर चली गयी|
भिखारी ने भी गर्दन उस तरफ किया, किनारे वाला घर अहमद भाई का था जिनके यहाँ से उसने अभी कुछ खाने के लिया था| मोहल्ले में सिर्फ वही अलग धर्म के थे, इसलिए पंडितजी उनसे दूर दूर ही रहते थे|
"ठीक है बाबू, तुम्ही दे दिया करो तो नहीं जायेंगे उनके घर मांगने", कहता हुआ भिखारी बैठ गया|
मज़हब ने एक और बंटवारा कर दिया था|


मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on July 10, 2016 at 7:04pm

बहुत बहुत आभार आ नीता कसार जी 

Comment by विनय कुमार on July 10, 2016 at 7:04pm

बहुत बहुत आभार आ राहिला जी 

Comment by Nita Kasar on July 8, 2016 at 8:55pm
पड़ोसी दिलेर हो और आँख की किरकिरी बन जाये तो सवाल मानसिकता को लेकर पैदा होना स्वाभाविक है ।सार्थक कथा के लिये बधाई आद०विनय सिंह जी ।
Comment by Rahila on July 8, 2016 at 11:18am
वाह ...बहुत खूब ,और जाने कौन, कौन से बंटवारे बाक़ी रह गए होने को ।जाने कितनो को बरबाद कर चुका ये शब्द ।अब नए शिकार ढूँढे हैं इसने।बहुत उम्दा रचना के लिए बहुत बधाई।सादर।
Comment by विनय कुमार on July 7, 2016 at 1:12pm

बहुत बहुत आभार आ अशोक कुमार रक्ताले जी| वहां पर //खाने के लिए लिया था// होगा, आभार आपका त्रुटियों को दर्शाने के लिए 

Comment by Ashok Kumar Raktale on July 6, 2016 at 10:41pm

सुन्दर लघुकथा. सच है कई बार ऐसे भी बंटवारा हो  जाता है. बहुत-बहुत बधाई आदरणीय विनय कुमार सिंह जी. सादर.

"जिनके यहाँ से उसने अभी कुछ खाने के लिया था".......कुछ अशुद्धि है देख लें. शायद यह वाक्य इस तरह होना था " जिनके यहाँ से उसे अभी कुछ खाना मिला था"

Comment by विनय कुमार on July 6, 2016 at 8:34pm

बहुत बहुत आभार आ शेख साहब, लोग आज भी इन्हीं सब में बंटे हुए हैं

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on July 6, 2016 at 6:55pm
दान-पुण्य ही नहीं, क्रय-विक्रय के मामलों में भी बँटवारा इन्हीं आधारों पर होता रहा है और लोकतंत्र वहीं का वहीं है, परिपक्व नहीं हो सका है। बहुत बढ़िया प्रस्तुति के लिए हृदयतल से बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय विनय कुमार सिंह जी।

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