For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

२२१  २१२१ १२२१ २१२

 

जब छीनने छुडाने के साधन नए मिले

हर मोड़ पर कई-कई सज्जन नए मिले

 

कुछ दूर तक गई भी न थी राह मुड़ गई

जिस राह पर फूलों भरे गुलशन नए मिले

 

काँटों से खेलता रहा कैसा जुनून था

उफ़! दोस्तों की शक्ल में दुश्मन नए मिले

 

जितने भी काटता गया जीवन के फंद वो  

उतने ही जिंदगी उसे बंधन नए मिले

 

अपनों से दूर कर न दे उनका मिज़ाज भी  

गलियों से अब जो गाँव की आँगन नए मिले

 

 

मौलिक/अप्रकाशित.

Views: 930

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 19, 2016 at 10:30pm

क्या कमाल की कहन के साथ क्या ही सशक्त ग़ज़ल हुई है ! वाह आदरणीय अशोक भाई जी.

हार्दिक शुभकामनाएँ और बधाइयाँ  

Comment by Ashok Kumar Raktale on July 19, 2016 at 9:54pm

आदरणीय समर कबीर साहब सादर नमस्कार, आपकी प्रतिक्रिया का मुझे इंतज़ार था. आप से दाद पाकर मेरा रचना कर्म सफल हुआ. आपके द्वारा सही कहा गया है "कर रहा" में एब आ गया था जिसे आपकी इस्लाह अनुसार मैंने बदल लिया है. पुनः आभार आपका. सादर.

Comment by Ashok Kumar Raktale on July 19, 2016 at 9:48pm

आदरणीय सुशील सरना साहब सादर नमन, प्रस्तुत गजल पर आपकी उपस्थिति और उत्सावर्धन के लिए हृदयातल से आभार. सादर.

Comment by Ashok Kumar Raktale on July 19, 2016 at 9:47pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी साहब सादर, प्रस्तुत गजल को पसंद करने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार. आपके सुझावों का दिल से स्वागत है. किन्तु  आपके द्वारा इंगित मिसरे पर आदरणीय समर साहब ने जैसे कहा है, वही मैं भी कहना चाहता हूँ की यह जिंदगी से कहा जा रहा है, इसलिए यहाँ 'में' का प्रयोग नहीं किया है. सादर.

Comment by Samar kabeer on July 19, 2016 at 8:38pm
जनाब अशोक कुमार रक्ताले साहिब आदाब,भाई क्या तारीफ़ करूँ आपकी ग़ज़ल की शब्द नहीं मिल रहे हैं,ऐसा लगता है किसी मंझे हुए ग़ज़लकार की ग़ज़ल है, बहुत ख़ूब वाह वाह इस शानदार प्रस्तुति पर ढेरों दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
जनाब गिरिराज भंडारी जी ने जिस शैर पर ऐतराज़ ज़ाहिर किया है में उससे सहमत नहीं,सानी मिसरा बिल्कुल साफ़ है,
"उतने ही ज़िन्दगी उसे बन्धन नए मिले"
यहां ज़िन्दगी को मुखातिब किया गया है इसलिए बात पूरी तरह स्पष्ट है, मुझे कोई कमी नहीं लगी ।
हाँ आख़री शैर के ऊला मिसरे में ऐब-ए-तनाफुर का दोष आ गया है "अपनों से दूर कर रहा उनका मिज़ाज भी"

"कर रहा" ये दोष इस तरह दूर हो सकता है अगर आप मुनासिब समझें तो :-

"अपनों से दूर कर न दे उनका मिज़ाज भी"
Comment by Sushil Sarna on July 19, 2016 at 7:24pm

काँटों से खेलता रहा कैसा जुनून था
उफ़! दोस्तों की शक्ल में दुश्मन नए मिले

वाह आदरणीय वाह ... बहुत ही खूबसूरत अशआर लिखे हैं आपने ... इस दिलकश ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय अशोक जी भाई साहिब।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 19, 2016 at 6:28pm

आदरणीय अशोक भाई , अच्छी गज़ल कही है , दिल से बधाइयाँ स्वीकार करें ।

बस - इस मिसरे में  --  उतने ही जिंदगी उसे बंधन नए मिले    --  में -  की कमी लगती है , बात अधूरी लग रही  है ।

उतने की हर क़दम उसे  बन्धन नये मिले  -- चाहें तो ऐसा किया जा सकता है

Comment by Ashok Kumar Raktale on July 19, 2016 at 7:25am

सादर आभार आदरणीया कल्पना भट्ट जी. सादर.

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 18, 2016 at 8:50pm

बढ़िया रचना हुई है आदरणीय | बधाई | 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi" replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
" कृपया और भी सदस्य अपना मंतव्य दें ।"
7 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"तरही का मुख्य उद्देश्य अभ्यास तक सीमित है, इस दृष्टि से और बहरों पर भी तरही मिसरे देना कठिन न होगा…"
14 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . घूस

दोहा सप्तक. . . . . घूस बिना कमीशन आजकल, कब होता है काम । कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।। घास…See More
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"सादर नमस्कार। मुझे ऐसी ही एक चर्चा की अपेक्षा थी। आवश्यकता महसूस हो रही थी। हार्दिक धन्यवाद और…"
yesterday

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के सभी सम्मानित सदस्यों को सादर नमस्कार। आदरणीय तिलक राज कपूर सर द्वारा…"
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"सभी आदरणीय सदस्यों को नमस्कार, एक महत्वपूर्ण चर्चा को आरम्भ करने के लिए प्रबन्धन समिति बधाई की…"
yesterday
Admin posted a discussion

ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा

साथियों,विगत कई माह से ओ बी ओ लाइव आयोजनों में कतिपय कारणवश सदस्यों की भागीदारी बहुत ही कम हो रही…See More
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय  अखिलेश जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी । सहमत एवं संशोधित "
yesterday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय सुशीलजी हार्दिक बधाई। लगातार बढ़िया दोहा सप्तक लिख रहें हैं। घूस खोरी ....... यह …"
yesterday
Jaihind Raipuri posted a blog post

वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं

ग़ज़ल 2122  1212  22वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैकितने दुःख दर्द से भरा दिल हैये मेरा क्यूँ हुआ है…See More
Mar 5
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । हार्दिक आभार आदरणीय । फागोत्सव…"
Mar 4
Nilesh Shevgaonkar and Dayaram Methani are now friends
Mar 4

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service