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बहुत क़र्ज़ है पापा मुझ पर

बहुत कर्ज़ है पापा मुझ पर
कैसे अदा करूं|


बचपन में मैं जब छोटी थी
कैरम की जैसे गोटी थी
घूमा करती छत के ऊपर
कभी न टिकती एक जगह पर

उन सपनों को उन लम्हों को 
कैसे जुदा करूँ ।


सुबह सुबह उठ कर तुम पापा
सरदी में ना करते कांपा
मुझे उठा कर मुंह धुलवाते
शिशु कवितायें भी तुम सिखलाते
कहाँ छिप गये तुम तो जा कर
कैसे निदा  करूं|

मेरे विवाह के थे वह फेरे
आँखों पर रूमाल के डेरे
थकी कमर थी, थकी थी आँखें
टूट रहीं थीं बदन की शाखें
उन लम्हों को इन आँखों से
कैसे विदा करूं

..................आभा

अप्रकाशित एवं मौलिक 

Views: 583

Comment

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Comment by Sushil Sarna on July 25, 2016 at 7:32pm

वाह आदरणीया बहुत ही सुंदर मन को छूती अभिव्यक्ति है। उंगली उस उंगली को तरसती है जिसने उसे चलना सिखाया राह दिखाई। इस मार्मिक अनुभूति वाली  रचना के लिए हार्दिक बधाई। 

Comment by Abha saxena Doonwi on July 25, 2016 at 6:07pm

आदरणीय Sheikh Shahzad Usmani sb जी  आपकी प्रतिक्रिया मिली मैं ह्रदय से आभारी  हूँ आपकी ..शुक्रिया ...   : )

Comment by Abha saxena Doonwi on July 25, 2016 at 6:04pm

आदरणीय समर कबीर  जी ,नमस्कार  आपकी  प्रतिक्रिया मुझे आगे  लिखने के लिए प्रेरित करतीं हैं हार्दिक अभिनन्दन  एवं नमन ...:)

Comment by Abha saxena Doonwi on July 25, 2016 at 6:03pm

आदरणीय राजेश कुमारी  जी,  आपकी  प्रतिक्रिया के लिए मैं ह्रदय से  आभारी हूँ ..नमन आपको ....:)

Comment by Samar kabeer on July 24, 2016 at 11:45pm
मोहतरमा आभा सक्सेना जी आदाब,बेहद जज़्बाती प्रस्तुति हुई है, बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on July 24, 2016 at 1:03pm
बहुत कुछ बयां करती भावपूर्ण प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत हार्दिक बधाई आपको आदरणीया आभा सक्सेना जी।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 23, 2016 at 7:17pm

बहुत सुन्दर भावात्मक अभिव्यक्ति आद० आभा जी बहुत- बहुत बधाई| 

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