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राष्ट्र का विकास रास्ते में पड़ा नहीं है,

विकास की राह में हर कोई बढ़ा नहीं हैं.

पर बयार बह रही है विकास की.

आम नागरिक ख़ुशी से उछल रहा है,

टैक्स की मार भी चुपचाप सह रहा है,

विकास की धार में बह रहा है.

 

नीति धर्म स्पष्ट है, समझ जाओगे.

सेवा करो, मेवा पाओगे,

सेवा करवाओगे तो

सेवा कर चुकाओगे.

नौकर मालिक से अड़े नहीं,

आज्ञाकारी माथे पे चढ़े नहीं,

ईमानदार सिर्फ शिकायत करता है.

और चुपचाप अपना काम करता है.

 

अब हम विकास के कुछ राज खोलें,

और महंगाई के पक्ष में आज बोलें

हमारी विकास की तस्वीर

विश्व के मानचित्र पर तभी चढ़ेगी,

जब महंगाई दिन दूनी और

रात चौगुनी बढ़ेगी.

 

विकास की राह में

आतंक के साये में भी  रहना पड़ेगा

लुट जाएँ, बर्बाद हो जाएँ,

अनाचार बलात्कार भी सहना पड़ेगा.

विकास और आतंक का है

चोली दामन का साथ.

इसीलिए हर आतंकी घटना के पीछे है

भविष्य के विकास का हाथ.

 

सरकारी लोग महंगाई महंगाई क्यों करते हैं,

पे कमीशन महंगाई भत्ते का ही इंतजार करते हैं

चाय सिर्फ पांच दस रुपये में और

दो रुपये में जीवन रक्षक दवा से इलाज करते हैं.

नौकरी अवसरों की हवा ही हवा.

विकास का नारा: हर मुश्किल की दवा! !

 

महंगाई का तो बहाना है,

विकास की नदी बहानी है.

दाल प्याज मिले न मिले,

हमें स्मार्ट सिटी बनानी है.

पिछड़ी सोच के लोग

करते रहेंगे हाय हाय.

दाल पतली तो क्या,

हर झोपडी में हो वाय फाय.

 

महंगाई से खत्म होती पैसे की तंगी,

क्रीम डियो चाहिए, रह लेंगी नंगी.

चिल्लर की बात भूलो, नोट भी अब

सिर्फ हजार पांच सौ के होंगे- जंगी!

बड़े नोट - कोई गरीब नहीं

ऐश ही ऐश, खाना नसीब नहीं.

 

हर घर में नोट, हर घर से वोट,

प्रचंड बहुमत, विरोध नहीं.

राष्ट्रीय नीति कि विकास हो,

कैसे हो इसका बोध नहीं.

 

देश आगे बढ़ाने के लिये त्याग तो करना पडे,

भले ही रोटी एक समय  या पतली दाल खानी पड़े

देश हमारा भी  विकसित-

देशों के साथ खड़ा  होगा,

अपनी इज्जत दुनियां में बढ़ेगी।

महंगाई तो अभी और बढ़ेगी,

महंगाई तो अभी और बढ़ेगी

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by डा॰ सुरेन्द्र कुमार वर्मा on August 23, 2016 at 8:21am
माननीय शहज़ादजी और अशोकजी का एवं अन्य सभी प्रोत्साहकों का आभार.
Comment by Ashok Kumar Raktale on July 28, 2016 at 8:33am

आदरणीय सुरेन्द्र वर्मा जी सादर बहुत सुन्दर विकास की सरकारी नीतियों पर तंज करती रचना.बहुत-बहुत बधाई. सादर.

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on July 27, 2016 at 6:05pm
रचनाकार ने मौजूदा हालात को बहुत नज़दीक़ से देखते समझते हुए गंभीर व्यंग्य किये हैं। विचारोत्तेजक कटाक्ष करती रचना के लिए हृदयतल से बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय सुरेन्द्र वर्मा जी।

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