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देश-देश चिल्लाते सारे,मतलब इसका समझो तो
संस्कृति,उत्सव परम्पराएँ, गुण माटी का समझो तो
मातृ भूमि का कण-कण सारा,संग उसी के जनता है
साथ सभी ये मिल जाते हैं,देश तभी तो बनता है।


हे भारत के युवा सुनो तुम, देशभक्ति मन में भरना
जीवन अपना इसकी खातिर,सारा अर्पण तुम करना
पढ़-लिखकर है बढ़ते रहना, भारत आगे करना है
खेल,ज्ञान में मान कमाकर, प्रतिमानों को गढ़ना है

मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 1, 2016 at 10:08pm
आदरणीय सुरेश भाई जी बहुत बहुत आभार आपका।आपको रचना पसन्द आई,सुखद लगा।सादर
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 1, 2016 at 10:07pm
आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर हार्दिक आभार प्रयास पर उपस्थित होकर हौंसलाफ़ज़ाई करने के लिए।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 1, 2016 at 10:05pm
आदरणीय गोपाल सर सादर नमन।आप सही कह रहें हैं।यह भूल लिखने बाद कई बार पढ़कर भाव और कथ्य को पुष्ट करने में कर बैठा और ऐसा संशोधन किया।अब कृपया सब सुधिपाठक पहला बन्द कुकुभ और दूसरा बन्द लावणी छंद के अनुसार पढ़ें।
आभार आदरणीय गोपाल जी।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 1, 2016 at 10:01pm
आदरणीया कल्पना दीदी अनुमोदन एवम् प्रोत्साहन के लिए सादर हार्दिक आभार।नमन
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on August 1, 2016 at 5:32pm
बहुत ही सुन्दर रचना।युवाओं में जोश जागृत करने की कोशिश की है आपने।सहृदय बधाई।
Comment by Shyam Narain Verma on August 1, 2016 at 5:29pm
सुंदर रचना के लिए बहुत बधाई सादर
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 31, 2016 at 2:56pm

आ० सतविंदर जी ,  ककुभ  छंद का  चरणांत  २ २  होता है  आपने दूसरे बंद की  शुरुआती दो पंक्तियों में  चरणांत  १  १ २ भरना /करना  रखा है . सुधारा अपेक्षित है .सादर  

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 31, 2016 at 7:32am
अच्छी रचना हुई है आदरणीय सतविंदर भैया । हार्दिक बधाई ।

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