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सब में मिट्टी है भारत की (नवगीत)

किसको पूजूँ

किसको छोड़ूँ

सब में मिट्टी है भारत की

 

पीली सरसों या घास हरी

झरबेर, धतूरा, नागफनी

गेहूँ, मक्का, शलजम, लीची

है फूलों में, काँटों में भी

 

सब ईंटें एक इमारत की

 

भाले, बंदूकें, तलवारें

गर इसमें उगतीं ललकारें

हल बैल उगलती यही जमीं

गाँधी, गौतम भी हुए यहीं

 

बाकी सब बात शरारत की

 

इस मिट्टी के ऐसे पुतले

जो इस मिट्टी के नहीं हुए

उनसे मिट्टी वापस ले लो

पर ऐसे सब पर मत डालो

 

अपनी ये नज़र हिकारत की

------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित))

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Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 5, 2016 at 10:07pm

तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आदरणीय सौरभ जी, मार्गदर्शन के लिए विशेष आभारी हूँ।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 5, 2016 at 10:06pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सुरेश जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 5, 2016 at 10:06pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीया प्रतिभा जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 5, 2016 at 10:05pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय श्याम नारायण ही

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 5, 2016 at 10:05pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय जयनित जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 5, 2016 at 10:04pm

बहुत बहुत शुक्रिया जनाब समर कबीर  साहब

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 5, 2016 at 10:04pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय कल्पना जी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 2, 2016 at 5:58pm

गीति-काव्य पर आपकी इस प्रस्तुति से हमारे जैसे पाठक के मन में उछाह और उत्साह का संचार हुआ है आदरणीय धर्मेन्द्र जी. हार्दिक शुभकामनाएँ और अशेष बधाइयाँ .. 

वैसे, नवगीत, या गीत ही, के संदर्भ में भावबोध और भाव-आवृति का संदर्भ लेना आवश्यक होगा. तात्पर्य यह है कि, भावबोध के संप्रेषण के क्रम में भाव-आवृति में निरंतरता को बनाये रखना गीति-प्रतीति की प्रस्तुतियों के हिसाब से रचनात्मक कर्म है. इस पर आदरणीय अवश्य ध्यान रखें. 

सादर

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on August 2, 2016 at 11:34am
आदरणीय श्री धर्मेन्द्र कुमार जी इस सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई ।
Comment by pratibha pande on August 1, 2016 at 10:12pm

भाले, बंदूकें, तलवारें

गर इसमें उगतीं ललकारें

हल बैल उगलती यही जमीं

गाँधी, गौतम भी हुए यहीं

 

बाकी सब बात शरारत की.....वाह   बहुत खूब ..हार्दिक बधाई प्रेषित है आपको आदरणीय  धर्मेन्द्र कुमार जी 

 

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