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मसअले कितने मुझे तेरे सवालों में मिलें

संशोधित

2122 1122 1122 112/22

मसअले कितने मुझे तेरे सवालों में मिले

यूँ अँधेरों की झलक दिन के उजालों में मिले

 

आपके ग़म से किसी को कोई निस्बत ही कहाँ

बेबसी दर्द हमेशा बुरे हालों में मिले

 

अब मेरे शहर में भी लोग खिलाड़ी हुए हैं

पैंतरे खूब हर इक शख़्स की चालों में मिले

 

चंद लम्हात मसर्रत के सुकूँ के कुछ पल

ऐसे मौके तो मुझे सिर्फ ख़यालों में मिले

 

दोस्ती और मुहब्बत के मनाज़िर हर सुब्ह

मेज़ पर लुढ़के हुए मय के पियालों में मिले

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by शिज्जु "शकूर" on November 28, 2016 at 2:47pm

बहुत बहुत शुक्रिया आ. बृजेश कुमार बृज जी

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 3, 2016 at 7:57pm

क्या कहने आदरणीय बहुत ही शानदार ग़ज़ल हार्दिक बधाइयाँ ....पटल पे हुई चर्चा गागर में सागर की तरह है 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on August 4, 2016 at 12:57pm
ग़ज़ल पर सार्थक चर्चा कज लिए आ. सौरभ सर एवं समर कबीर साहब का बहुत बहुत शुक्रिया। निश्चित ही पढ़ने वालों को फायदा होगा
Comment by Samar kabeer on August 4, 2016 at 12:21am
जनाब शिज्जु शकूर जी आदाब,एक बार आपकी ग़ज़ल पर सरसरी सी प्रतिक्रिया देकर मैं गुज़र चुका हूँ ,अब दोबारा हाज़िर हूँ ।
जब इस ग़ज़ल के एक मिसरे को लेकर आपसे टेलिफ़ोनिक चर्चा हुई थी उस वक़्त आपने यह बताया था कि आपने अहमद 'फ़राज़' साहिब की ज़मीन में क़ाफ़िया बदल कर कही है ,उस वक़्त आपने मुझे पूरी ग़ज़ल नहीं सुनाई थी । रदीफ़ को लेकर आपकी ग़ज़ल पर जो चर्चा हुई है वह बहुत ही सार्थक है,मैं इसमें थोड़ा सा इज़ाफ़ा करना चाहूँगा ,अहमद 'फ़राज़' साहिब की ग़ज़ल की रदीफ़ 'में मिलें' है और आप की रदीफ़ हो गई है 'मिले', 'फ़राज़' साहिब ने इस ग़ज़ल में जो क़वाफ़ी लिये हैं वो सब बहुवचन के हैं ,आपके क़ाफ़िये भी बहुवचन के हैं ,इन दोनों ग़ज़लों में फ़र्क़ यह है कि फ़राज़ साहिब के क़ाफ़िये रदीफ़ के साथ पूरा पूरा इंसाफ़ कर रहे हैं और आपके क़ाफ़िये रदीफ़ के साथ इंसाफ़ नहीं कर रहे हैं,इसकी वजह यह है कि क़ाफ़िये से पहले बयान के अल्फ़ाज़ रदीफ़ को टच नहीं कर रहे हैं,जबकि उन्हें रदीफ़ से मेल खाना चाहिये था ,मिसाल के तौर पर मैंने अभी आपके क़वाफ़ी में एक मतला और एक शैर फ़िल बदीह कहा है,देखिये :-

"काम कुछ ऐसा करें सबके ख़यालों में मिलें
तज़किरे अपने ज़माने की मिसालों में मिलें"

"रात का गहरा अंधेरा हमें बहकायेगा
ठीक तो यह है कि हम दिन के उजालों में मिलें"

कहने का मतलब यह है कि ग़ज़ल में रदीफ़ की भूमिका सबसे अहम होती है इसलिये ग़ज़ल में इस पर तवज्जो देना बेहद ज़रूरी है।
Comment by Ashok Kumar Raktale on August 3, 2016 at 11:55am

आदरणीय भाई शिज्जू जी सादर, सुन्दर गजल कही है.बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें. किन्तु मिले की जगह मिलें का प्रयोग कुछ खटक रहा है. प्रतिक्रियाओं में इस पर चर्चा भी  हुई ही है. सादर.  


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 2, 2016 at 6:08pm

// क्या हम मिलते हैं को मिलें नहीं लिख सकते? //

सॉरी, मैं समझा ही नहीं शिज्जू भाई. थोड़ा और स्पष्ट करें तो मुझे भी कुछ क्लीयर हो. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on August 2, 2016 at 6:04pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ सर मेरे मन में एक शंका और है, क्या हम मिलते हैं को मिलें नहीं लिख सकते?


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 2, 2016 at 6:00pm

आदरणीय सौरभ भाई जी , आपने व्याकरण की बहुत बारीक बात समझाई , और दोनो के अंतर को उदाहरण देकर पानी की तरह साफ कर दिया । मन मे ख़टक होती थी पर व्यक्त करने के लिये शब्द नही मिलते थे । मेरे खयाल से इसे और दुरुस्ती की ज़रूरत नही है , पूर्ण है ये ।

एक बात और -- ऐसे ही शंका की स्थिति  , ही और भी के उपयोग मे भी आती है , वैसे ये जगह सही नही है इस बात के लिये इन दो शब्दों मे भी बहुत बारीक अंतर है ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 2, 2016 at 5:16pm

इस ग़ज़ल पर कुछ कहने के पूर्व एक तथ्य साझा करना चाहता हूँ. हो सकता है, मैं सुधीजनों के द्वारा इस विन्दु पर दुरुस्त भी किया जाऊँ. यह मेरा सौभाग्य होगा.

 
वस्तुतः मिलें, खेलें, दौड़ें आदि जैसी क्रियाएँ बहुवचन संज्ञा की ’अपेक्षा’ या किसी ’चाहत’ का परिचायक होती हैं. जबकि किसी क्रिया का भूतकाल (Past Tense) एकवचन या बहुवचन की संज्ञा के साथ हो क्रमशः मिले, खेले, दौड़े ही होगी. यानी, ’ए’ की मात्रा के साथ अनुस्वार का प्रयोग नहीं होगा. जैसे, तीन लड़के दौड़े. वे सभी खेले. आदि

उदाहरण के लिए एक संवाद लें -
’इस समस्या की कोई राह अवश्य निकलेगी. आप भोपाल जाकर मिथिलेशजी से मिलें. .’
’मैं भोपाल गया था. वहाँ मिथिलेश जी ही नहीं, राजूरकरजी, सूर्याजी, समरजी, अशोकजी भी नहीं मिले..’

विश्वास है, आपको मेरा कहा स्पष्ट हुआ होगा.

इस हिसाब से आपकी इस ग़ज़ल के कई मिसरे किसी अपेक्षा या आशा का भाव संप्रेषित नहीं करते, बल्कि शुद्ध भूतकाल की घटनाओं का निरुपण हैं. अतः उन मिसरों में व्याकरण-दोष है. आपसे हुई टेलिफोनिक चर्चा के अनुसार आप इस कहे का सही अर्थ समझ रहे होंगे, शिज्जू भाई.
शुभेच्छाएँ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 2, 2016 at 1:32pm

चंद लम्हात मसर्रत के सुकूँ के कुछ पल

ऐसे मौके तो मुझे सिर्फ ख़यालों में मिलें    --  बहुत खूब , आ. शिज्जु भाई , इस शे र और गज़ल के लिये दिली मुबारकबाद आपको ।

मतले के सानी मे , यूँ अँधेरों को ज्यूँ अँधेरों  कर ना क्या सही नही होगा ?    सोच लीजियेगा  अगर सही लगे तो ।

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