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गीत (गीतिका छंद)/सतविन्द्र कुमार

भारती को अब नहीं फिर से सताना चाहिए
दुश्मनों को देश के अब ये बताना चाहिए

आज अपने देश में जो ये घृणा का दौर है
पागलों ने सब किया है ये नहीं कुछ और है
नफरतों को बेचते जो काम ऐसे कर रहे
बांटते हैं देश को बस जेब अपनी भर रहे
उन सभी के चेहरे से पट हटाना चाहिए
दुश्मनों को देश के अब ये बताना चाहिए।।१।।


देश के जो रक्षकों को पत्थरों से मारते
दुश्मनों से जा मिलें वो क्या कभी हैं हारते
आज मिलकर हम सभी उत्तर उन्हें देते चलें
साथ आएँ वो हमारे या विदा लेते चलें
देश अपने से उन्हें अब तो भगाना चाहिए
दुश्मनों को देश के अब ये बताना चाहिए।।२।।

जो रहे गद्दार सारे क्यों उन्हें हम सह रहे?
जो सदा से देश को ही बाँटने की कह रहे
उन सभी को अब नहीं रहना यहाँ ये सोचलें
बाँध अपने बिस्तरों को वे यहाँ से तो चलें
सह नहीं सकते उन्हें यूँ अब जताना चाहिए
दुश्मनों को देश के अब ये बताना चाहिए।।३।।

मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 2, 2016 at 3:20pm
आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर हार्दिक आभार
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 2, 2016 at 3:19pm
आदरणीय समर कबीर साहब सादर।अनुमोदन एवं प्रोतसाहन के लिए तहेदिल शुक्रिया।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 2, 2016 at 2:11pm

आदरणीय सतविन्द्र भाई , देश भक्ति के भावओं से सराबोर आपकी रचना के लिये हार्दिक बधाई आपको ।

Comment by Shyam Narain Verma on August 2, 2016 at 11:26am
"देशभक्ति के भाव से सजी रचना हेतु सादर बधाई |" सादर 
Comment by Samar kabeer on August 2, 2016 at 10:18am
जनाब सतविंदर कुमार जी आदाब,बहुत सुंदर लगा आपका गीत,इस प्रस्तुति पर। दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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