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ग़ज़ल - मेरा ‘मै’ ही अनजाना सा लगता है - ( गिरिराज भंडारी )

22   22   22   22   22   2    -- बहरे मीर

सब कुछ जाना पहचाना सा लगता है

मेरा ‘मै’ ही अनजाना सा लगता है

 

जिसकी अपने अन्दर से पहचान हुई

वो फिर सबको दीवाना सा लगता है

 

मन का खाली पन फैला यूँ वुसअत में

जग सारा अब वीराना सा लगता है

 

घर के हर कमरे की चाहत अलग हुई

बूढ़ा छप्पर  गम ख़ाना सा लगता है

 

दिल का हर कोना दिखलाये हैं  लेकिन

हर दिल में इक तहखाना सा लगता है

 

अपनेपन के अंदर भी अब बुना हुआ

षड़यंत्री ताना बाना सा लगता है  

 

मूछें आयीं चेहरे पर, तो जाने क्यूँ

सच कहना भी, समझाना सा लगता है

 

कहो नींद से अब आती है, आ जाये

दिल मेरा कुछ कुछ माना सा लगता है

 

साथ निभाता है हँसने में आँसू भी

अश्क़ों से कुछ याराना सा लगता है

*********************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 3, 2016 at 4:40pm

जिसकी अपने अन्दर से पहचान हुई

वो फिर सबको दीवाना सा लगता है-------बहुत खूब । हार्दिक बधाई आदरणीय

Comment by रामबली गुप्ता on August 16, 2016 at 6:53pm
ग़ज़ल नही जबरदस्त ग़ज़ल हुई है आद0 गिरिराज भाई जी। खूबे बधाई लीजै।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 16, 2016 at 3:30pm

आदरणीया कल्पना जी , उत्साह वर्धन के लिये आपका हृदय से आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 16, 2016 at 3:29pm

आदरनीय तस्दीक भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ।

आपने सही कहा है , छत और महफिल स्त्रीलिंग है , अभी सुधार करता हूँ , आपका हृदय से आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 16, 2016 at 3:27pm

आदरणीय सतविन्द्र भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया आपका ।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 16, 2016 at 6:34am
अपनेपन के अंदर भी अब बुना हुआ
षड़यंत्री ताना बाना सा लगता है

मूछें आयीं चेहरे पर, तो जाने क्यूँ
सच कहना भी, समझाना सा लगता है ।

बहुत खूब । हार्दिक बधाई आदरणीय
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 15, 2016 at 9:14pm

मोहतरम जनाब गिरिराज साहिब ,  अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद और दाद क़ुबूल फरमाएं ----शब्द  महफ़िल और छत इस्त्रीलिंग हैं और शेर नंबर --4 का सानी और शेर 8 का ऊला मिसरा एक बार बहर के हिसाब से देख लीजिये -----

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 15, 2016 at 4:24pm
आदरणीय गिरिराज जी नमन।उम्दा ग़ज़ल के लिए सदर हार्दिक बधाई।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 15, 2016 at 1:41pm

आदरणीय आशुतोष भाई ,हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 15, 2016 at 1:32pm
आदरणीय सुरेश भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया आपका ।

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