ग़ज़ल ( जश्ने आज़ादी )
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शिकवे गिले भुलाकर उल्फत को हम बढ़ाएं ।
मिल जुल के आओ जश्ने आज़ादी हम मनाएं ।
तोड़ें न मंदिरों को मस्जिद नहीं गिराएं ।
माहौल एकता का हम देश में बनायें ।
क़ुर्बानियों से जिनकी आज़ाद हम हुए हैं
हम उनके हक़ में आओ दस्ते दुआ उठायें ।
उल्फत से हम रहेंगे झगड़ा नहीं करेंगे
क़ौमी निशाँ के नीचे आओ क़सम ये खाएं।
गैरों ने जिस अदा से अपने वतन को लूटा
अपनों को भा गयी हैं शायद वही अदाएं ।
बस मेरी रहबरों से इतनी सी है गुज़ारिश
मज़हब की आड़ लेकर दंगे नहीं कराएं ।
इंसानियत के नाते हम सब हैं भाई भाई
तस्दीक़ कब है ज़ेबा बाहम लहू बहाएं ।
(मौलिक व अप्रकाशित )
Comment
मोहतरम जनाब सौरभ साहिब , ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का शुक्रिया ---
संदेशपरक प्रस्तुति के लिए हार्दिक धन्यवाद आदरणीय तस्दीक अहमद साहब.
मोहतरम गोपाल नारायण साहिब , ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का शुक्रिया
bahut badhiyaa , saadar .
मोहतरम जनाब समर कबीर साहिब आदाब , ग़ज़ल में गहराई से शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया ,मेहरबानी ----
मोहतरम जनाब शेख शहज़ाद उस्मानी साहिब , ग़ज़ल में गहराई से शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया ,मेहरबानी --
मोहतरम जनाब गिरिराज साहिब , ग़ज़ल में गहराई से शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया ,मेहरबानी --
मोहतरमा कल्पना साहिबा , ग़ज़ल में गहराई से शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया ,मेहरबानी --
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