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ग़ज़ल - हम भी कुछ पत्थर लेते हैं ( गिरिराज भंडारी )

22  22  22  22  22  22  22  22 -- बहरे मीर

छोटी मोटी बातों में वो राय शुमारी कर लेते हैं

और फैसले बड़े हुये तो ख़ुद मुख़्तारी सर लेते हैं

 

वहाँ ज़मीरों की सच्चाई हम किसको समझाने जाते

दिल पे पत्थर रख के यारों रोज़ ज़रा सा मर लेते हैं

 

चाहे चीखें, रोयें, गायें फ़र्क नहीं उनको पड़ता, पर

जैसे बच्चा कोई डराये , वालिदैन सा डर लेते हैं

 

कल का नीला आसमान अब रंग बदल कर सुर्ख़ हुआ है

पंख नोच कर सभी पुराने, चल बारूदी पर लेते हैं

 

वैसे तो ईमान सभी के खून पसीने में है शामिल

लेकिन गंगा भ्रष्ट बही तो वो भी थोड़ा तर लेते हैं

 

कहीं कहीं सूराखें ताज़ा दिखते तो हैं आसमान में

शायद सच हो ! चल हाथों में हम भी कुछ पत्थर लेते हैं

 

उख़ड़ी सांसे काबू करने जिस जा रुकती है पगड़ंडी

वहीं कहीं वीरान ज़मीं पे आ चल अपना घर लेते हैं

***********************************************
मौलिक एवँ अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 26, 2016 at 12:34pm

आदरनीया राहिला जी , गज़ल पर उपस्थिति , और सराहना के लिये आपका आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 26, 2016 at 12:33pm

आदरणीय मनन भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ।

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 26, 2016 at 11:09am
बेहतरीन प्रस्तुति , बधाई , आदरणीय गिरिराज भंडारी जी , सादर।
Comment by pratibha pande on August 26, 2016 at 10:41am

कहीं कहीं सूराखें ताज़ा दिखते तो हैं आसमान में

शायद सच हो ! चल हाथों में हम भी कुछ पत्थर लेते हैं.... आपकी  रचनाओं के भाव बहुत गहरे होते हैं  आदरणीय  .. बधाई स्वीकार करें इस रचना पर ...सादर 

Comment by Rahila on August 25, 2016 at 10:48pm
"छोटी मोटी बातों में वो राय शुमारी कर लेते हैं
और फैसले बड़े हुये तो ख़ुद मुख़्तारी सर लेते हैं"
जैसे ही ग़ज़ल का पहला शेर पढ़ा यूँ लगा जैसे किसी घर के मुखिया की बात हो रही हो।कहने को तो पूरी ग़ज़ल ही शानदार बनी है।बहुत बधाई आदरणीय सर जी!सादर
Comment by Manan Kumar singh on August 25, 2016 at 9:03pm
आदरणीय गिरिराज भाई,एक अच्छी गजल के लिए दिली बधाइयाँ कबूल फरमायें।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 25, 2016 at 7:53pm

आदरनीय समर भाई , सुखन नवाज़ी और दादो तहसीन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ।

Comment by Samar kabeer on August 25, 2016 at 6:34pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है, शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।

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