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सावन
सूखी रह गई,
सूखे भादो मास

विरहन प्यासी धरती कब से,
पथ तक कर हार गई
पनघट पूछे बाँह पसारे,
बदरा क्यों मार गई

पनिहारिन
भी पोछती
अपनी अंजन-सार

रक्त तप्त अभिसप्त गगन यह,
निगल रहे फसलों को
बूँद-बूँद कर जल को निगले,
क्या दें हम नसलों को

धूँ-धूँ कर
अब जल रही
हम सबकी अँकवार

कब तक रूठी रहेगी हमसे,
अपना मुँह यूॅं फेरे
हम तो तेरे द्वार खड़े हैं
हृदय हाथ में हेरे


तू जननी
हर जीव की
अखिल जगत आधार ।

-रमेश चौहान
........................................
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by रमेश कुमार चौहान on September 15, 2016 at 8:27pm

आदरणीय सौरभ पाण्ड़ेयजी, आपके इस विश्लेषण से मुझे आत्म अवलोकन का अवसर प्राप्त हुआ । आपके प्रेरणा से ही मैं सतत् अभ्यास कर्म में लगा हुआ हूँ । जी,, मैं व्याकरणीय दोष के निवारण हेतु संघर्षरत हूँ । आपके सुझाव अनुसार अब अध्ययन में बल देने का प्रयास करूंगा । इसी प्रकार मार्गदर्शन करते रहियेगा ।
सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 15, 2016 at 4:30pm

सावन 
सूखी रह गई,................................ सावन स्त्रीलिंग कबसे हो गया ? 
सूखे भादो मास

विरहन प्यासी धरती कब से,
पथ तक कर हार गई ................... शब्द-स्वर से उच्चारण दोष हो रहा है. ऐसे टंग-ट्विस्टर संयोजन न रख अकरें आदरणीय
पनघट पूछे बाँह पसारे,  |
बदरा क्यों मार गई       | ............. दोनों पंक्तियों को मिला कर देखिये तो प्रश्न किससे पूछा जा रहा है ? ’बदरा कौन मार’ गयी ?

पनिहारिन 
भी पोछती
अपनी अंजन-सार....................... सार का अर्थ क्या है ? यदि सार अवशेष है जोकि सही अर्थ है तो वह पुल्लिंग शब्द है.

रक्त तप्त अभिसप्त गगन यह,
निगल रहे फसलों को....................... गगन एकवचन है तो इसकी क्रिया बहुवचन की कैसे हो गयी ? 
बूँद-बूँद कर जल को निगले,  |
क्या दें हम नसलों को         | ........... इन दोनों पंक्तियों की तारतम्यता सही नहीं बनी है. 

धूँ-धूँ कर..................................... धू-धू  
अब जल रही
हम सबकी अँकवार.. 

 

कब तक रूठी रहेगी हमसे,
अपना मुँह यूॅं फेरे 
हम तो तेरे द्वार खड़े हैं
हृदय हाथ में हेरे........................... किससे पूछा जा रहा है ?


तू जननी 
हर जीव की
अखिल जगत आधार ।................... कौन ? 

आदरणीय रमेश जी, उपर्युक्त टिप्प्णी से यह अवश्य स्पष्ट हो रहा होगा कि भावाभिव्यक्ति में स्पष्टत बहुत अधिक आवश्यक है. आपकी कोशिश आश्वस्त तो करती है लेकिन यह आवश्यक अभ्यासकर्म ही नहीं गहन अध्ययन भी मांग रही है. 

प्रस्तुति हेतु सादर धन्यवाद

 

Comment by Samar kabeer on September 15, 2016 at 4:05pm
जनाब रमेश चौहान साहिब आदाब,बहुत सुंदर लगी आपकी कविता,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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