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बरसों बात मिली 
है सहेली मेरी 
एक चाई का 
प्याला और खट्टी
मीठी यादें 
समेट कर 
लायी है 
सहेली मेरी 
चल चले 
मेले में 
कुछ ख़ुशियाँ 
बटोरने 
कुछ कची
कचौरी खाने
कुछ इमली
तोड़ने 
अठन्नी कम 
पड़ गयी 
थी घसीटे
की ठेली में
कान मरोड़ के 
वापस ली 
वो चोरी हुई 
मोफ़्ली हमसे 
चलो चलके 
बदला लें
उस जलेबी 
वाले से लल्ली
ताने मार के 
देता था 
दो घेरी हमको 
आसमान तक 
हो आती थी वो 
मेले के हर 
मुसाफ़िर को 
वक़्त आगे 
ना बड़ने दें
दिल ना किसी 
को तोड़ने दें
समझदारी को 
ना बड़ने दे 
मासूमियत की 
किताबों को 
आपस में ही 
लड़ने दें
नही भाती मुझे 
ये जलती 
बुझती बातें
दिन का भोझ
और 
बिन नींद की रातें
चल चल उसी
मेले में 
मुफ़ली
चुराएँ उस 
ठेले में 
और मुड़ के 
गुम हो जाएँ 
उस मेले में 
मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on October 1, 2016 at 1:58pm

आदरणीया दीपू जी सादर, अच्छी अभिव्यक्ति है किन्तु शब्दों की शुद्धता और टंकण त्रुटियों पर ध्यान दें. सादर.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 21, 2016 at 2:40pm

आ. दीपू जी अच्छी रचना है बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 20, 2016 at 12:46pm
मोहतरमा दीपू जी इस सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई प्रेषित है । सादर ।
Comment by Samar kabeer on September 19, 2016 at 2:55pm
मोहतरमा दीपू जी आदाब,बहुत सुंदर कविता लिखी आपने बधाई स्वीकार करें ।

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