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बिंदु और सिंदु

बिंदू
मिटकर ही
बनता है
सिंधु ।
पानी की
टपकती बूँद
समंदर को
छू लेतीं है
मिटाकर अपना
आप
विशालता को
छू लेती है
समंदर पाने
के लिए
बूँद बनना
पड़ता है
कुछ हासिल
करने के लिए
खोना भी पड़ता है
कभी बिंदु भी
बनना पड़ता है
कभी सिंधु भी
बनाना पड़ता है

मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 529

Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on September 22, 2016 at 10:11pm

आदरणीया दीपू जी सादर  समंदर पाने के लिए बूंद बनना पड़ता है......वाह ! सुन्दर अभिव्यक्ति है. बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें. सादर.

Comment by S.S Dipu on September 21, 2016 at 2:51pm
Samar kabeer ji bohut bohut dhyanwaad apka
Abhaar
Dipu

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 21, 2016 at 2:34pm

आ. दीपू जी अच्छी रचना हुई है बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Samar kabeer on September 20, 2016 at 6:15pm
मोहतरमा दीपू जी आदाब,बढ़िया कविता लिखी आपने,इस ओरस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sushil Sarna on September 20, 2016 at 2:45pm

आदरणीया दीपू जी सागर से भावों को बूंदों में समेंटे इस भावपूर्ण प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई। 

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 20, 2016 at 12:51pm
आदरणीया दीपू जी सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई ।

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