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लघुकथा- फर्क (अर्पणा शर्मा)

 "अरे , मकान का काम देखने मम्मी जी , पापाजी को भेज दें।", राखी कुनमुनाई, "बेकार ही घर में बैठे हैं" वो सोचने लगी, " हम तो खाना निपटा कर फिर थोड़ी देर वहाँ काम देख आएँगे", सास-ससुर के जाते ही उसने आजादी की साँस ली और जल्दी से मायके फोन लगाया । वैसे तो सुबह उठकर सबसे पहले अपने पिताजी से बात करके ही उसका दिन शुरू होता है पर फिर भी पूछना था कि उन्होंने ठीक से खाना खाया कि नहीं । तभी नन्ही पलक ठुमकती आई-"मम्मी सू आरही है", "अरे भई, अपन से नहीं होता ये सब, बच्चों की सू-सू, पाॅटी", राखी ने भुनभुनाते हुए नौकर को बुलाया और पलक के साथ भेजा। " बड़ी आफत है, इतने लोगों का खाना-पीना..", उसने नौकर को खाना बनाने के निर्देश दिये और खुद अपनेकमरे में आराम करने लगी। सोच रही थी कि उसकी ननद का कैसे भी ब्याह होजाये वरना बाद में उसके ही गले आपड़ेगी। "वो तो अच्छा है कि सास-ससुर, ननद दूसरे शहर में हैं और कभी-कभार आते हैं तब भी उसे खटका लगा ही रहता है। दकियानुसी लोग हैं ", राखी सोच रही थी...."बड़ों के सामने सिर पर पल्ला लो, पैर छूकर आशीर्वाद लो, घर साफ रखो, पूजा में साथ बैठो, सबको खाना खिलाओ, ये भी कोई जिंदगी है??", "ना जींस टाॅप पहन सकते , ना दोस्तों के साथ पार्टीे और मौज-मस्ती ...ऊपर से कहीं जाना चाहोगे तो सास-ससुर कहते हैं कि ननद को भी साथ लेजाओ....", " ऐसे कोई हमेशा चिपका के रखता है क्या...??" , " भई, मैंने तो शादी के पहले दिन ही उन लोगों को अपने कमरे में आने से मना कर दिया, आखिर मेरी प्राइवेसी भी कोई चीज है....", "मेरे पापा ने इतने लाड़-प्यार से पाला है, क्या मैं इनकी चाकरी करूँ! !", राखी अपनी सोच में मगन कुढ़ रही थी, "...और ये भी तो छोटी बहन का इतना लाड़ करते हैं, भला ऐसे भी कोई लुटाता है क्या? ??"

तभी द्वार की घंटी बजी, नौकर ने दरवाजा खोला और अचानक पीछे से आकर किसी ने लाड़ से उसकी आँखें ढांप लीं । "अरे पाखी तू, आगई कालेज से", उसकी आँखें चमक उठीं, "चल तू खाना खाले फिर मेरे कमरे में आराम करना, और वो जो सलवार सूट मैंने नया सिलवाया है वो तू कल कालेज पहन जाना", उसका दिल भर आया- "माँ के देहांत के बाद 2 साल छोटी बहन को बेटी की तरह पाला है, अपनी शादी के बाद इसकी फिर पढ़ाई शुरू करवाई और कार चलाना, माॅड़ बनकर रहना सिखाया, तभी तो इसके लिए अच्छा लड़का मिलेगा.."। राखी का मायका पैदल दूरी पर होने के कारण पाखी काॅलेज के बाद रोज यहीं आजाती थी। " दीदी वो क्या है कि, फीस के पैसे ...", बोलते-बोलते पाखी रूक गई । " हाँ -हाँ, ये ले 15 हजार रूपये हैं, फीस के देने के बाद बचे पैसों से अपने लिए कुछ ले-लेना", राखी ने बड़े ममत्व से कहा।  संतोष की गहरी साँस लेते वह बोली- "आखिर तेरे जीजाजी इतना कमाते किस लिये हैं ...!!"

अप्रकाशित एवं मौलिक

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on July 21, 2018 at 12:20am

अंतर/दोगलापन स्पष्ट करती बहुत बढ़िया प्रस्तुति।हार्दिक बधाइयां आदरणीया अपर्णा शर्मा जी।

Comment by Arpana Sharma on October 7, 2016 at 3:24pm
बहुत शुक्रिया



मेरी लघुकथा पसंद करने के लिये आपका बहुत धन्यवाद आदरणीय श्रीमान् समर कबीर साहाब एवं आदरणीय श्रीमान् शकूर जी
Comment by Samar kabeer on October 6, 2016 at 8:46pm
मोहतरमा अर्पणा जी आदाब,बहुत उम्दा लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 6, 2016 at 10:38am

इंसान बहुत स्वार्थी होता है कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में उसका ये स्वभाव सामने आ ही जाता है, बहुत बहुत बधाई आपको  इस लघुकथा के लिए

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