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Arpana Sharma's Blog (32)

" रक्षाबंधन "- कविता/ अर्पणा शर्मा,भोपाल

रक्षाबंधन पर्व ले आई,

श्रावण शुक्ल पूर्णिमा,

भर लाई अतुलित उल्लास,

पुनीत-पावन स्नेहिल ऊष्मा,

मैं  हर्षित पर्व यह सुमंगल मनाऊँगी,

हाथों सुंदर मेंहदी रचाऊँगी,

भाई मंगल तिलक करने 

मैं अवश्य ही आऊंगी, 

हाथ से रेशम की ड़ोरी बनाऊंगी,

जरी का उसमें झुमका लगाऊंगी,

चौक पूर, पाट पर तुमको बिठाऊँगी,

श्रीफल, रोली-अक्षत थाल सजाऊँगी,

राखी तुम्हारी कलाई सजाऊंगी,

तिलक चर्चित कर उन्नत भाल पर,

मंगल-दीप से आरती…

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Added by Arpana Sharma on August 27, 2018 at 3:30pm — 2 Comments

" टूटन का पुष्पण" - कविता/ अर्पणा शर्मा, भोपाल

हँस पड़ती हूँ ,

अक्सर मैं,

मुझे तोड़ने में

मशगूल,

अपनी अमोल ऊर्जा,

व्यर्थ करते उन,

मिथ्या हितैषियों को

देखकर,



टूटन को नित,

यूँ पान करती

आई हूँ कि,

ये गरल तो मेरी

हर श्वांस में

घुला-मिला है,

इसे नित जीकर....



कि इसके बिना,

हल्की-हल्की सी,

श्वांसों पर यकीं

ना होना

लाजिमी है,



तिल भर भी तो,

 नहीं बची है,

कोई जगह

जहाँ किसी को

अवसर मिले,

मुझे…

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Added by Arpana Sharma on August 4, 2018 at 3:40pm — 6 Comments

*" गुरु पूर्णिमा "* - कविता/अर्पणा शर्मा, भोपाल

गुरू-महात्म्य है अपरंपार,

गुरूवर नमन आपको बारंबार,

सर्वप्रथम गुरू हैं मात-पिता,

जग से जोड़ा अपना नाता,

पालन-पोषण-शिक्षा सँभाल,

दायित्वपूर्ण इनका सब संसार,

गुरूवर नमन आपको बारंबार,

ज्ञान दीप प्रज्वलित किये,

अज्ञान-तम सब हर लिये,

अहसान हैं हम पर अपार,

कैसे चुके इस ऋण का भार,

गुरूवर नमन आपको बारंबार,

हमें थे अविदित ईश्वर भी,

उनकी भी प्रतीति गुरू से ही,

गुरू से जाने…

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Added by Arpana Sharma on July 27, 2018 at 7:54pm — 6 Comments

लघुकथा- " छद्म- संवेदना"/ अर्पणा शर्मा, भोपाल



"मैं कैसे अपने गहन दुःख का इज़हार करूँ । मेरे पिताजी की तबियत अत्यंत खराब है। करीब दस दिनों से आई.सी.यू.में भर्ती हैं । आप सभी की प्रार्थनाओं और दुआओं की बहुत जरूरत है। आपके संबल से ही हम इस मुश्किल समय से उबर पाएँगे  "



अत्यंत मार्मिक शब्दों से भरा फेसबुक पर अपना स्टेटस अपड़ेट करने के बाद कुणाल उस पर मिल रहे लाईक्स पर अपना धन्यवाद और प्रार्थनाओं, दुआओं से भरे संदेशों का उत्तर देने में व्यस्त होगया। ना जाने कितनी देर वह ऑनलाइन बैठा ख़ैरियत पूछने वालों को अपने पिताजी…

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Added by Arpana Sharma on July 24, 2018 at 3:07pm — 9 Comments

लघुकथा- रिसते खूनी नासूर

सुबह से ठंडे चूल्हे को देख आहें भरती वह अपनी छः वर्षीय बेटी और तीन वर्षीय बेटे को पास बिठाए गहरे मातम में ड़ूबी थी। उसे लकवा सा मार गया था। उसका मस्तिष्क मानो सोचने-विचारने की क्षमता खो बैठा था। पूरी रात उसने वहीं जमीन पर बैठे गुज़ार दी थी। दोनों बच्चे भी वहीं उसकी गोदी में पड़े- पड़े कब सो गये थे उसे कोई होश ही नहीं था। पड़ोस की बूढ़ी अम्मा ही बच्चों के लिए खाना ले आई थी। 

" आह..! अब ऐसे घिनौने पाप का साया मेरे और इन बच्चों के सिर पर हमेशा मँड़राता रहेगा।"

उसकी दुःखभरी कराहें निकल…

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Added by Arpana Sharma on July 22, 2018 at 3:30pm — 6 Comments

नीरज जी को श्रृद्धाजंली - अर्पणा शर्मा भोपाल

गीतों की लय 

है ड़गमगाई,

सुरों की सरगम

स्तब्ध हो आई,

भाव खो बैठे,

हैं धीरज,

कैसे कह दें

अलविदा

आपको कविवर

हे नीरज,

शब्द-लय सुर-गीत

अप्रतिम -अद्वितीय ,

युगों- युगों रहेंगे

गुँजायमान,

है धन्य-धन्य,

यह भारत भूमि,

पाकर आपसा अनन्य,

कलम का धनी...!!

 (मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by Arpana Sharma on July 20, 2018 at 11:00pm — 7 Comments

"धरा की पाती"/ कविता-अर्पणा शर्मा, भोपाल

मैं तृषित धरा ,

आकुल ह्रदया,

रचती हूँ ये पाती,

मेरे बदरा,

तुम खोए कहाँ,

मुझसे रूठे क्यों,

हे जल के थाती,



दूर-दूर तलक,

ना पाऊँ तुम्हें,

कब और कैसे,

मनाऊँ तुम्हें,

नित यही मैं ,

जुगत लगाती,

साँझ- सबेरे,

राह निहारे ,

मैं अनवरत ,

थकती जाती,



आओ जलधर,

जीवन लेकर,

बिखेरो सतरंग,

सब ओर मुझपर,

तड़ित चपला की,

शुभ्र चमक में,

श्रृंगारित हो,

सुसज्जित हो,

हरी चूनर मैं,…

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Added by Arpana Sharma on July 20, 2018 at 4:30pm — 9 Comments

"नूतन-वर्ष "-कविता /अर्पणा शर्मा

उँगलियों पर रहे थिरकती,  

लेखा-जोखा समय का रखती,  

देखो वो चली, विदा ले चली,  

हाथ हिलाते, हँसते-मुस्काते,  

ये बारह माहों की गिनती,

तीन सौ पैंसठ दिनों का सफर,

खत्म कर पकड़ेगी, इक कोरी-नई ड़गर,

इसके नए पन्नों पर होगी ,

अब लिखी इक इबारत नई,

छोड़ अनेकों पीछे, अनेकों साथ जोड़ते,

देखो वो आई, आ ही चली,

इक नूतन बारह माहों की गिनती,

समय-प्रवाह थपेड़े में ,

जीवनयात्रा के रेले में,

इक वर्ष और…

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Added by Arpana Sharma on December 31, 2017 at 10:22pm — 7 Comments

"हिन्दी-दिवस" -अर्पणा शर्मा भोपाल

राजभाषा हिन्दी के दिवस का

अवसर है पधारा,

14 सितम्बर 1949 के दिन

देवनागरी हिन्दी को

हमने अपनी

राजभाषा स्वीकारा,

यही ऐतिहासिक दिन

हिन्दी दिवस नाम से

जाता है पुकारा,

भारत की अनेकों भाषाओं के बीच

हिन्दी का आकर्षण

सबसे न्यारा,

ज्यों विशाल समुद्र में

मिल…

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Added by Arpana Sharma on September 15, 2017 at 3:00pm — 5 Comments

" स्वतंत्रता जय-राग "/ अर्पणा शर्मा

स्वतंत्रता जय-राग सुनाओ,

जय-हिन्द की जयकार गुँजाओ,

सब जन हिलमिल करके आओ,

प्रखर गीत कोई ऐसा गाओ...!



क्षेत्र ,धर्म, जाति मिल सब,

छिन्न करें अस्तित्व जब तक,

खतरे में देश-रक्षा हर क्षण,

दुश्मन की हों मौंजें तब तक,



भारत माँ को अब न लजाओ,

एकसूत्र निरापद हो जाओ,

सब मिल देश सबल बनाओ,

प्रखर गीत कोई ऐसा गाओ...!



आतंक कहर ढाता रहा,

शूरवीर प्राण लुटाता रहा,

रक्त-रंजित इस धरा पर,

जन-जीवन छटपटाता रहा,



और न… Continue

Added by Arpana Sharma on August 15, 2017 at 12:00am — 3 Comments

"अपनी धरती -अपना अंबर" - अर्पणा शर्मा /पर्यावरण दिवस पर विशेष

आओ बनाएँ निर्मल, अक्षय, सुंदर ,

यह प्रिय धरती अपनी-अपना अंबर



प्रकाश ध्वनि जलवायु में,

सर्वत्र प्रसारित प्रदूषण विषधर,

करें पर्यावरण विषैला नित ड़ंस-ड़ंस कर,

बढ़ गये हैं छिद्र ओजोन परत पर,

नानाविध रोग करते जीवन दूभर ,



कट रहे वर्षावन अंधाधुँध,

हर ओर फैल रहे विशाल बंजर,

वर्षा आह्वान में ये सक्षम क्यूँकर,

बंजर से कैसे निर्मित हों जलधर,

कई जीव-पाखी खोगये विलुप्त होकर,



कहीं रूठ जाते वर्षा के ये कहार,

कहीं बरस जाते… Continue

Added by Arpana Sharma on June 5, 2017 at 8:07pm — 4 Comments

" यवनिका" -एक क्षणिका /अर्पणा शर्मा

खिंच जाएगी,
ड़ोरी सहसा,
थम जायेगी ,
ये कठपुतली,
भागते समय में निर्बाध,
यवनिका गिरेगी,
जीवन नाटक की,
और नैपथ्य में ,
गूँजेगी एक आवाज़,
कि अब तुम्हारा,
समय समाप्त ...!!"

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Arpana Sharma on June 2, 2017 at 11:23pm — 7 Comments

"फाॅर्मलिटी" /लघुकथा :अर्पणा शर्मा

"देखिये, मेरे फ्लैट की रजिस्ट्री की सारी रकम आपके बताए सर्विस प्रोवाइड़र के खाते में भिजवा दी गई है , आज रजिस्ट्री की आखिरी तारीख है और अभी तक  आपने मेरे पेपर तैयार नहीं किये",

 सुबह -शाम बिल्ड़र के ऑफिस के चक्कर लगा-लगा कर त्रस्त हुए जयेश ने अंततः लगभग गिड़गिड़ा कर उसके मैनेजर से कहा।



"देखिए मिस्टर जयेश रजिस्ट्री की बाकी फाॅर्मेलिटी आपने पूरी नहीं की, आप मेरे साथ को-ऑपरेट नहीं करेंगे तो कैसे चलेगा" ,

बिल्ड़र के मैनेजर ने नितांत सधे हुए और सर्वथा व्यावसायिक लहजे में जयेश को… Continue

Added by Arpana Sharma on April 26, 2017 at 5:39pm — 4 Comments

" अस्पृश्य" - लघुकथा :अर्पणा शर्मा

मालकिन ने रसोई के एक कोने में रखी थोड़ी पिचकी सी , घिसी थाली, कटोरी , ग्लास और चम्मच उठा,  उसमें खाना सजाया और खाना बनाने वाली को रसोई के बाहर एक कोने में जमीन पर बिठाकर उसके सामने थाली रख दी।



खाना बनाने वाली का आज उस घर में पहला ही दिन था। जल्दी से खाना खाकर जूठे बर्तन सिंक में रख दिये क्योंकि बर्तन मलने वाली भी आती थी।



मालकिन ने देखा तो उसे कड़क शब्दों में निर्देश मिले -

" खाना खाकर अपने बर्तन धोकर वहाँ उस कोने में रखना। दूसरे बर्तनों से छूना नहीं चाहिए… Continue

Added by Arpana Sharma on April 18, 2017 at 5:00pm — 14 Comments

"चिरनिद्रा- चिर-विश्रांति "/कविता - अर्पणा शर्मा

नदी के भँवर में घूमते पत्ते से,

जो खिंचता-जाता समाने उसमें,

जीवन है ड़ूबता- उतराता,

काल के नित गहराते भँवर में,

धवल आकाशगंगा के,

गहन काले गह्वर की मानिंद,

हमें आलिंगन में लेने को आतुर,

ओह ये मृत्यु ...!!

 

शनैः-शनैः सब समाता उसमें,

धीरे-धीरे खिंचते जारहे,

हम भी नित उसी ओर,

जन्म के साथ ही,

है शुरू होजाती,

यह गणना पलछिन,

यह माटी का पुतला ,

जीवित रहेगा ,

आखिर कितने दिन,



उलझते जीवन के व्यापार में… Continue

Added by Arpana Sharma on April 16, 2017 at 7:41pm — 11 Comments

"फागुन की पूनम"/ अर्पणा शर्मा

आई फागुन की पूनम,

बरसाये शीतलता मेरे आँगन,

स्वच्छ अंबर,

चमकीला तारामंड़ल,

झिलमिल-झिलमिल,

शुभ्र-धवल,

आई फागुन की पूनम,



बसंती मदमस्त पवन,

दे हिलोंरें मंद-मंद,

पलाश, सेमल दहकाएं अगन,

मस्ती में बौराए,

उत्साहित सर्वजन,

ढ़ोल, मंजीरे, नगाड़़े,

टोलियाँ करें फाग गायन,

आई फागुन की पूनम,



होली दहन को है सजाई,

ले गोद प्रहलाद को,

होलिका थी इसमें समाई,

असत्य की भावना राख हुई,

सत्य पर कोई आँच न… Continue

Added by Arpana Sharma on March 9, 2017 at 3:04pm — 2 Comments

" कैसे कहूँ ...."- कविता /अर्पणा शर्मा

कैसे कहूँ मन की व्यथा,

सारे दुख-सुख का,

सब लेखा-जोखा,

किसने कितनी दी पीड़ा,

किस-किसने कब,

दिया मुझे धोखा,

वो गठरी पीछे छोड़ ,

बस बढ़ जाती हूँ,

निरंतर आगे की ओर,

समयधारा में धुल जाते हैं,

बहुत गहन घाव भी,

सप्रयास बिसरा देती हूँ ,

पीड़ा की सघन छाँव भी,

मुँह कर खड़ी होती हूँ,

झिर्री से आती धूप की ओर,

लेती हूँ उसका ताप भी,

भरती हूँ उसकी आब भी,

अपनी देह और अंतस में,

आशा की दरारों से,

वहाँ बिखर जाने देती हूँ… Continue

Added by Arpana Sharma on January 10, 2017 at 2:03pm — 9 Comments

“नूतन वर्षाभिनंदन - 2017” /कविता :- अर्पणा शर्मा

365 दिनों के,

माला में पिरोये मनके,

समय को कब

अवकाश है पाना,

न जीवन का,

स्थगन है कर पाना,

साल दर साल,

ये माला है जपते जाना,

नव वर्ष की

इस नई माला में,

नई आशाओं का

झुमका है लगाना,

परिश्रम की स्वेद बूंदों से

इसे है पखारते जाना,

विगत को संजोकर इतिहास में

चुनकर हंसी के मोती,

प्रेम-उल्लास की झालरों से

आगत के स्वागत में,

आँगन है सजाना,

जीवन आनंद की बूंदों का

रसास्वादन है करते… Continue

Added by Arpana Sharma on December 29, 2016 at 5:30am — 8 Comments

"भोपाल- तीन दिसम्बर" -मेरे सर्वप्रथम हाइकू : अर्पणा शर्मा

गैस त्रासदी,
पीड़ित मानवता,
कराह उठी...!!

भीड़ उन्मादी,
कारखाने बाहर,
देखे बर्बादी,

की है मुनादी
मिलेगा मुआवजा,
क्या है ये काफी???

कैसे भगाया,
एंड़रसन यहाँ,
है अपराधी,

नासूर से ही,
जख़्म यहाँ रिसते
वर्षों बाद भी,

बही थी यहाँ,
भूलेगा नहीं कभी,
मौत की नदी...!!!

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Arpana Sharma on December 3, 2016 at 4:00pm — 5 Comments

"झिलमिल धूप"/कविता - अर्पणा शर्मा, भोपाल

सर्द सिहराती शिशिर की सुबह,

भेदकर कर कोहरे की नजर,

ओसकणों को चुंबन देकर,

मेरे आँगन धूप उतर आई थी ,

गुनगुनी, ऊष्म, स्नेहिल ज्यों

एक प्रेमालिंगन ले आई थी,

रूपहली-सुनहरी सुरमाई सी,

सूर्य वधु ज्यों प्रातः लेती अंगड़ाई सी,



ये दुछत्ती खिल जाये प्यारी,

महके छोटी सी मेरी फुलवारी,

धूप ने धूम मचाई थी,

चंपा, चमेली, सेवंती की बहार सी,

गेंदे, गुलाब, हरसिंगार भी,

ज्यों सुंदरी रंगीली चुलबुलाई सी,



धूप घुस आती हर दर्रे… Continue

Added by Arpana Sharma on November 26, 2016 at 4:21pm — 8 Comments

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