For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

दशहरा मिलन (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

पिछली रात लेखन कर्म में बिताने की वज़ह से आज बस में लम्बा सफ़र करते समय शेख़ साहब को बार-बार नींद आ रही थी। बस स्टॉप पर पहुंचने पर बस से उतरकर टैक्सी में बैठे ही थे कि ज़ेबों में मोबाइलों व पर्स को टटोला। मंहगा वाला मोबाइल ग़ायब था। बस जा चुकी थी। बस का नंबर तक याद नहीं था। कुछ लोगों ने तुरंत पुलिस को ख़बर करने को कहा। कुछ ने मोबाइल की सिमों को तुरंत बंद (लॉक) कराने की सलाह दी। किन्तु इन्सानियत पर भरोसा करने वाले कुछ लोगों की राय थी कि सब्र करो, फोन करते रहो, शायद मोबाइल उठाने वाला बंदा बुरी नीयत का न हो। दशहरे के मौक़े पर मोबाइल सिम दफ़्तर पर कर्मचारी अनुपस्थित मिले। शेख़ साहब बड़ी उलझन में थे। पुलिस चौकी जाने से पहले ही मोबाइल ग्राहक सेवा केंद्र के अधिकारियों से सम्पर्क करने की कोशिश कर रहे थे, तभी उनका मन हुआ कि उन सिम नंबरों पर फोन करके देखा जाए। फोन लग गया । दूसरी तरफ से नरेश नाम के किसी व्यक्ति ने एक निश्चित जगह पर मिलने को कहा। दिये गये पते पर शेख़ साहब तुरंत पहुँचे। पिछड़ी बस्ती थी। एक कलारी के पास उस व्यक्ति का घर था। शहर की अन्य कॉलोनियों की तरह रावण दहन जैसी दिखावटी कोई गतिविधि वहाँ नज़र नहीं आ रही थी। चारों तरफ़ बस शांति ही थी। उस व्यक्ति ने अपनी ज़ेब से मोबाइल निकालते हुए शेख़ साहब से कहा- 'भाईसाब, कैसा मोबाइल रखते हो, हमसे तो चला कर भी नहीं बन रहा था! 'कोड' डला है शायद, वरना हम ही फोन कर देते!"

शेख़ साहब ने लपक कर मोबाइल लेते हुए कहा- 'बड़ी मेहरबानी आपकी! आपने फोन उठा लिया, वरना सुना है कि पुलिस वाले सिम बंद तो करवा देते हैं, मोबाइल नहीं खोज पाते! आप बहुत अच्छे इन्सान हो!"

"मज़दूर हूँ साहब, मेहनत की रोटी खाता हूँ! पांच-सात हज़ार के मोबाइल पर कैसे नीयत ख़राब करता?"

यह सुनकर शेख़ साहब ने पर्स से पांच सौ का नोट निकाला और उसे देते हुए कहा- "पांच-सात का नहीं, पूरे अठारह हज़ार रुपये का है यह!"

"नहीं भाईसाब, मुझे कोई ईनाम नहीं चाहिए! आज तो हमने अपना दशहरा मना लिया!" दूर से ही नरेश ने कहा।

यह सुनकर शेख़ साहब ने उसे सीने से लगा लिया। मुहर्रम के अवसर पर आज ऐसा दशहरा मिलन देखकर आसपास खड़े लोगों के चेहरों पर अद्भुत चमक और संतुष्टि थी!

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 723

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Arpana Sharma on October 17, 2016 at 10:41pm
बहुत सुंदर भावार्थ लिए लघुकथा का ताना-बनाना बुनाई है। बहुत बधाई आदरणीय शेख उस्मानी जी
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 15, 2016 at 8:16pm
आदरणीय शेख शहजाद उस्मानी साहब लगता है ताजी घटना है यह। सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें । सादर ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 13, 2016 at 8:48pm
ख़ुद के ताज़े तज़ुर्बे पर आधारित इस रचना के अनुमोदन व अपने विचार साझा करते हुए हौसला बढ़ाने के लिए तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया मोहतरम जनाब तस्दीक़ अहमद ख़ान साहब और मोहतरमा राजेश कुमारी साहिबा ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 13, 2016 at 8:14pm

बहुत बढ़िया सार्थक लघु कथा बेहतरीन सन्देश व् प्रेरणा देती हुई दिल से बधाई लीजिये आ० उस्मानी जी |

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on October 12, 2016 at 9:04pm

मोहतरम जनाब शेख शहज़ाद उस्मानी  साहिब ,  हालाते हाज़रा पर यकजहती के रंग में डूबी सीख देती सुन्दर लघु कथा के  लिए दिल से मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
" सादर नमस्कार आदरणीय मंच। कुछ अन्य सुझाव: 1- सदस्यों से सहयोग राशि एकत्रित कर ओबीओ की पत्रिका…"
yesterday
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अच्छा सुझाव"
yesterday
Gajendra shrotriya replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"प्रतिष्ठित मंच के सभी सम्माननीय सदस्यों को सादर प्रणाम🙏ओ बी ओ परिवार के समक्ष बनी इस विषम परिस्थिति…"
Sunday
Manjeet kaur replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"ओ बी ओ मंच से बहुत कुछ सीखने को मिला इसके बंद होने की खबर दुखद और पीड़ादाई लगी। अजय गुप्ता जी की…"
Saturday
Manjeet kaur commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"धर्मेंद्र कुमार जी आज के मुश्किल दौर में इतना जिगरा ! यथार्थ और सटीक वर्णन के लिए बहुत बहुत बधाई"
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . .मंच

दोहा सप्तक. . . . . मंचअभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।यह जग…See More
Saturday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)

बह्र: 22 22 22 22 22 2 रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिएजंगल का कानून है पहला, चुप रहिएमँहगाई से…See More
Saturday
रोहित डोबरियाल "मल्हार" posted a blog post

दास्तां

एक हो दास्तां तो सुनाएं,लंबी है कहानी, फिर कभी।मिले थे जिस जगह इक उम्र पहले,वो धुंधली सी निशानी,…See More
Saturday
Awanish Dhar Dvivedi posted a blog post

समय

समय को दोष देना क्यूँ समय जीना सिखाता है समय की गति सुनिश्चित है समय ही तो विधाता है।। समय का खेल…See More
Saturday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ जी"
Saturday
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"उम्मीद है कि इस पटल से संबंधित कोई अच्छी खबर आएगी।"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"इस सुंदर बुनावट और कहन पर आज नजर पड़ी, आदरणीय धर्मेन्द्र जी.  हार्दिक बधाई   "
May 25

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service