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ग़ज़ल - हमें यक़ीन है हम घर तराश लेते हैं ( गिरिराज भंडारी )

1212   1122   1212   22

जो हिकमतों से मुक़द्दर तराश लेते हैं

पड़े जो वक़्त वो मंज़र तराश लेते हैं

 

वो मुझसे पूछने आये हैं मानी हँसने का

सुकूँ के पल से जो महशर तराश लेते हैं 

 

उन्हे यक़ीन है वो आँधियाँ बना लेंगे

हमें यक़ीन है हम घर तराश लेते हैं 

 

अगर मिले उन्हे रस्ते में भी पड़ा पत्थर

तो उसके वास्ते वो सर तराश लेते हैं

 

उन्हे है जीत का ऐसा नशा कि लड़ने को

हमेशा ख़ुद से वो कमतर तराश लेते हैं

 

उड़ें तो कैसे उड़ें जिसको सब कहें उड़ना

हरेक मौक़ों से जो डर तराश लेते हैं

 

वो जिनके हाथ हुये खून से हैं लाल बहुत    

छिपाने हाथ वो ख़द्दर तराश लेते हैं

*************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

Views: 457

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 27, 2016 at 11:21pm
आदरणीय भाईसाब कमाल की इस ग़ज़ल के लिये हार्दिक बधाई सआदतप्रणाम के साथ
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on October 27, 2016 at 8:56pm

मोहतरम जनाब गिरिराज साहिब , अच्छी ग़ज़ल हुई है  शेर दर शेर  दाद और  मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं 

Comment by Samar kabeer on October 26, 2016 at 3:07pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
Comment by Sushil Sarna on October 26, 2016 at 12:26pm

उन्हे यक़ीन है वो आँधियाँ बना लेंगे
हमें यक़ीन है हम घर तराश लेते हैं

वाह आदरणीय गिरिराज जी भाई साहिब वाह आपने बहुत खूब अहसास तराशे हैं .... इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए दिल से सलाम कबूल फरमाएं सर।

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