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ग़ज़ल - ये अंदर से आयी है वो रोशनी है ( गिरिराज भंडारी )

122   122   122   122  

ये माना कि हर सम्त कुछ बेबसी है

मगर हौसलों की बची ज़िन्दगी है

 

बुझेगी नहीं चाहे आंधी भी आये  

ये अंदर से आयी है वो रोशनी है

 

लकीरें हथेली की सारी थीं झूठी

जो कहती थीं आगे खुशी ही खुशी है

 

वो भूँके या काटे, डसे आस्तीं को  

अगर आदमी था, तो वो आदमी है

 

बिना ज़हर वाले बने हैं गिज़ा सब

ये क़ीमत चुकाई यहाँ सादगी है

 

घराना उजालों का था जिनका, उनका    

सुना है अँधेरों से भी हमदमी है

 

ज़रा देखना दौर मुझ तक भी आये

मिजाज़ अपना यारो ज़रा बलगमी है

**********************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

Views: 601

Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 12, 2016 at 8:42pm
वाह बेहद खूबसूरत ग़ज़ल हुई
Comment by Samar kabeer on November 10, 2016 at 8:38pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
आख़री शैर के ऊला मिसरे में'मुझ तक'को "हम तक"करना मुनासिब होगा क्या ?क्योंकि सानी मिसरे में 'अपना'शब्द आगया है, देखियेगा ।
Comment by Sushil Sarna on November 10, 2016 at 4:03pm

लकीरें हथेली की सारी थीं झूठी
जो कहती थीं आगे खुशी ही खुशी है

वाह गज़ब आदरणीय क्या शे'र है मजा आ गया। .... खूबसूरत अशआर और खूबसूरत अहसासों की इस ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय गिरिराज जी भाई साहिब।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 10, 2016 at 2:53pm

आदरनीय मनन भाई , उत्साह वर्धन के ल्लिये आपका हृदय से आभार ।

Comment by Manan Kumar singh on November 10, 2016 at 11:47am
आदरणीय गिरिराज भाई बधाई एक संदेशपरक गजल के लिये,'....सुना है अँधेरों से भी हमदमी है'।

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