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सब्र है सबसे बड़ा जऱ दोस्तो(तरही ग़ज़ल)/सतविन्द्र कुमार राणा

बह्र :2122 2122 212
---
उसने नगमा एक गाया देर तक
ऐसे ही हमको सुनाया देर तक।

सब्र है सबसे बड़ा जर दोस्तो
आलिमों ने यह सुझाया देर तक।

इश्क है वो रास्ता जो पाक है
सोच कर मन में बिठाया देर तक।

भाग उनके ही भले सब मानते
हो बड़ों का जिनपे साया देर तक।

भूख से तड़पा बहुत है यार वो
इसलिए उसने यूँ खाया देर तक।

भूलने की सोच कर आगे बढ़ा
भूल मैं उसको न पाया देर तक।

साथ चलने की कसम खाता रहा
आस में मुझको चलाया देर तक।


यह फकीरों ने बताया है हमें
"धूप रहती है न साया देर तक।"

जो भी राणा इस जहाँ से हो गया
बस भला ही याद आया देर तक।

मौलिक एवं प्रकाशित

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Comment

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Comment by Mahendra Kumar on December 5, 2016 at 8:03pm
आदरणीय सतविन्द्र भाई जी, बढ़िया ग़ज़ल हुई है। दाद के साथ मुबारक़बाद क़ुबूल कीजिए। आपने मतले में क़ाफ़िये की जगह गुनगुनाया और सुनाया शब्द लिए हैं इसलिए मेरे हिसाब से आपका क़ाफ़िया उ + नाया होना चाहिए। शेष गुणीजन बताएँगे। सादर।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 4, 2016 at 11:06pm
आदरणीय मिथिलेश जी मैं आपका आशय समझ पा रहा हूँ।मुझे भी यह गड़बड़ ही लग रही है।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 4, 2016 at 11:05pm
आदरणीय समर कबीर जी सादर नमन मैं इसे दुरुस्त कर रहा हूँ।सादर।अनुमोदन एवं प्रोत्साहन के लिए आभार!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 4, 2016 at 10:42pm

आदरणीय सतविन्द्र जी, ग़ज़ल में काफियाबंदी पर गुनीजनों की इस्लाह की प्रतीक्षा कर रहा हूँ. सादर 

Comment by Samar kabeer on December 4, 2016 at 2:47pm
जनाब सतविन्दर कुमार'राणा'जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल है, मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
सातवें शेर में 'आश' को "आस" कर लें ।

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