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गजल(तिरछी हो जातीं नजरें हैं)

22 22 22 22
तिरछी हो जाती नजरें हैं
अश्कों की कटती फसलें हैं।1

धड़कन माफिक साँसें चलतीं
प्यास बनी ये दो पलकें हैं।2

लहराती बदली-बाला तू,
उड़ जाती, फिर सपने टें हैं।3

खूब जमाये रंग सभी ने
अल्फाजी उनकी फजलें हैं।4

लोग लिये हैं संग विधाएँ
अपने पास महज गजलें हैं।5
.

मौलिक व अप्रकाशित@

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Comment

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Comment by Mohammed Arif on January 15, 2017 at 5:14pm
आदरणीय मनन कुमारजी, आदाब ! ढेरों बधाईयाँ स्वीकार करें ।
Comment by Manan Kumar singh on January 15, 2017 at 4:04pm
गोपाल भाई,hindi men.
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 14, 2017 at 4:01pm
vfcfbfb

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"आ. भाई अमित जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।"
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