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सभी रिश्ते है मतलब के ये मानो या न मानो तुम,
है मिलते प्यार में धोखे ये मानो या न मानो तुम,
 
रहूँ मैं राम भी बनके अगर हो भरत सा भाई,
है माता कैकई घर मे ये मानो या न मानो तुम,      
 
यकीं मानो न बिगड़ेगा कभी भी गैर के कारण,
करेंगे वार बस अपने ये मानो या न मानो तुम,
 
पड़े अब आँख पर परदे नये रिश्तों के शीशे से,
हैं टूटे खून के धागे ये मानो या न मानो तुम,
 
कलेजा चीर भी दोगे नहीं कुछ मोल है "बागी"
रहा पानी न आँखों में ये मानो या न मानो तुम

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Comment

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Comment by Rash Bihari Ravi on May 26, 2011 at 12:54pm
khubsurat
Comment by R N Tiwari on May 26, 2011 at 12:37pm
बहुत सुन्दर रचना . ह्रदय से प्रस्फुटित सत्य को उजागर करती शुद्ध रचना. बधाई .
आर .एन. तिवारी
 

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 26, 2011 at 10:02am
पुनिया साहिब ग़ज़ल के अदना विद्यार्थी की प्रस्तुति आप को पसंद आई इसके लिए बहुत बहुत आभार आपका |

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 26, 2011 at 10:01am
अम्बरीश भाई, एक एक शे'र का विवेचना कर आपने पूरी ग़ज़ल को जो इज्जत बख्सी है उसके लिए शुक्रगुजार हूँ मैं, साथ में बेहतरी के लिए इशारा आपके दरियादिली का एक उदाहरण है, निसंकोच सुझाव दिया करे, बागी हमेशा सर माथे पर स्वीकार करेगा | बहुत बहुत धन्यवाद |
Comment by nemichandpuniyachandan on May 26, 2011 at 9:35am
Shree,Ganesh Jee"Bagi" shahib,Rahoon main Raam bhee banake agar ho bharat saa bhaee,Hai maataa kaikaee ghar me ye maano na maano tum.Waah..Waah. Nafees kalam ke liye mubarakbad.
Comment by Er. Ambarish Srivastava on May 26, 2011 at 12:14am
//सभी रिश्ते है मतलब के ये मानो या न मानो तुम,

हैं मिलते प्यार में धोखे ये मानो या न मानो तुम,//

अय हय! क्या पते की बात बताई है .........यहीं तो मात का गया इण्डिया ......



//रहूँ मैं राम भी बनके अगर भाई भरत सा हो,,

हैं माता कैकेयी घर में ये मानो या न मानो तुम, //

दिखाया चीर के सीना गज़ब का शेर कह डाला,

किसी की आप बीती है ये मानो या न मानो तुम. .



//यकीं मानो न बिगड़ेगा कभी भी गैर के कारण,

करेंगे वार बस अपने ये मानो या न मानो तुम,//

गज़ब गज़ब !! लाख टके की बात कह डाली !



//पड़े अब आँख पर परदे नये रिश्तों के शीशे से,

हैं टूटे खून के धागे ये मानो या न मानो तुम,//

अय हय! यही तो घर-घर की कहानी है मेरे भाई!



//कलेजा चीर भी दोगे नहीं कुछ मोल है "बागी"

रहा पानी न आँखों में ये मानो या न मानो तुम,//

बड़ी अच्छी ग़ज़ल कह दी बधाई तुमको बागी जी,

हैं खाए जख्म अब गहरे ये मानो या न मानो तुम.


आदरणीय भाई बागी जी ! यह ग़ज़ल कलेजे पर सीधा ही वार करती है .......इस हेतु हृदय से बधाई सहित साधुवाद स्वीकारें ....... सादर .....
Comment by विवेक मिश्र on May 26, 2011 at 12:10am
/यकीं मानो न बिगड़ेगा कभी भी गैर के कारण,
करेंगे वार बस अपने ये मानो या न मानो तुम,/
एकदम सही बात है. आजकल पराये लोगों से ज्यादा, अपनों से ही डर बना रहता है.जावेद अख्तर साहब ने भी कहा है-
'गैरों को कब फुर्सत है दुःख देने की,
जब होता है कोई हमदम होता है'
अपेक्षाकृत लम्बे रदीफ़ को भी बखूबी निभाया है. हार्दिक बधाई.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 25, 2011 at 10:25pm
धन्यवाद धर्मेन्द्र भाई |
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 25, 2011 at 9:31pm
बहुत सुंदर ग़ज़ल है बागी जी। एकदम कलेजा चीर देने वाली। बधाई

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 25, 2011 at 6:06pm
आदरणीय धरम भाई, ग़ज़ल पसंद करने हेतु बहुत बहुत आभार |

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