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एक सूरज ...

सो गया
थक कर
सिंधु के क्षितिज़ पे
ख़ुदा के दर पे
ज़मीं के
बशर के लिए
चैन-ओ-अमन की
फरियाद लिए
जलता हुआ
एक सूरज

संचार हुआ
नव जीवन का
भर दिया
ख़ुदा के नूर को
ज़मीं के ज़र्रे ज़र्रे में
करता रहा भस्म
स्वयं को
स्वयं की अग्नि में
बशर के
चैन-ओ-अमन
के लिए
एक सूरज

रो पड़ा
देखकर
बशर की फितरत

नूरे बख़्शीश को
समझ न सका

ग़ुरूर में
खुद को
ख़ुदा से बढ़ा कर लिया

लगा नापने
ज़मीन-ओ-आसमाँ को
अपने अहम् के पाँव से

शायद इसीलिये
रोज रोज
थक हारकर
सो जाता है
बशर को
समझाते समझाते
सिंधु के क्षितिज़ पे
अपने में
उम्मीद के
सूरज को समेटे
एक सूरज

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Views: 500

Comment

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Comment by Sushil Sarna on February 22, 2017 at 6:43pm

आदरणीय Mohammed Arif साहिब प्रस्तुति की आत्मीय प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on February 22, 2017 at 6:42pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी सृजन के भावों ने आपको छुआ, सृजन उपकृत हुआ , हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on February 22, 2017 at 6:41pm

आदरणीय शिज्जु शकूर साहिब प्रस्तुति में निहित भावों को सम्मान देने का शुक्रिया।

Comment by Sushil Sarna on February 22, 2017 at 6:40pm

आदरणीया Neelam Upadhyaya जी प्रस्तुति के भावों को आत्मीय मान देने का शुक्रिया।

Comment by Sushil Sarna on February 22, 2017 at 6:37pm

आ.शिज्जु शकूर साहिब रचना को अपने आत्मीय स्नेह से पल्लवित  करने का हार्दिक आभार। 

Comment by Mohammed Arif on February 21, 2017 at 5:16pm
आदरणीय सुशील सरना जी आदाब बेहतरीन रचना के लिए बधाई स्वीकार करें ।
Comment by नाथ सोनांचली on February 21, 2017 at 4:33pm
आदरणीय सुशील सरना जी सादर अभिवादन। बहुत खूबसूरत रचना की आपने, इस खूबसूरत अतुकांत के लिए बधाई निवेदित हैं।
Comment by Neelam Upadhyaya on February 21, 2017 at 4:06pm

अदरणीय सुशील सरना जी, बहुत ही बेहतरीन रचना । बधाई स्वीकार करें ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on February 21, 2017 at 3:16pm

बहुत सुंदर आ. सुशील सरना जी बेहतरीन रचना हुई है बहुत बहुत बधाई आपको

कृपया ध्यान दे...

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