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निकलना एक दिन है इस मकाँ से

बह्र 1222 1222 122

करो उम्मीद मत यूँ आसमाँ से ||
बिना मिहनत न कुछ मिलता वहाँ से||

उठाते साथ थे छप्पर सभी जब
हटा विश्वास क्यूँ फिर दरमियाँ से ||

कफ़न सर से कहाँ वो बाँधते हैं
मुहब्बत है जिन्हें अपनी ही जाँ से ||

जहन्नम से नही कम होती दुनिया
कोई भी गर नही जाता जहाँ से ||

कमी क्या रह गई इस ज़िन्दगी में?
दुआएँ मिल गई गर बाप माँ से ||

निकल कर अश्क वो कहते हैं अक्सर
जिसे कोई न कह पाये जुबाँ से ||

करो मत प्यार इतना 'नाथ' तन को
निकलना एक दिन है इस मकाँ से ||

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 962

Comment

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Comment by नाथ सोनांचली on April 4, 2017 at 4:31am
आद0 महेंद्र जी सादर अभिवादन, आभार
Comment by नाथ सोनांचली on April 4, 2017 at 4:30am
भाई सतविंदर जी साभार
Comment by नाथ सोनांचली on April 4, 2017 at 4:30am
आद0 ब्रजेश कुमार ब्रज जी साभार
Comment by नाथ सोनांचली on April 4, 2017 at 4:29am
आदरणीय रवि शर्मा जी आभार
Comment by Mahendra Kumar on April 2, 2017 at 10:10pm
बहुत बढ़िया ग़ज़ल है आदरणीय सुरेन्द्र जी। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। सादर।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on April 1, 2017 at 5:55pm
आदरणीय सुरेन्द्र भाई जी,कमाल गजल हुई है,हार्दिक बधाई!
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 31, 2017 at 8:38pm
वाह आदरणीय बहुत ही शानदार ग़ज़ल हुई सादर बधाई
Comment by Ravi Sharma on March 31, 2017 at 9:40am
आदरणीय भाई सुरेन्द्र जी, बहुत खुब, बधाई
Comment by नाथ सोनांचली on March 31, 2017 at 9:24am
आद0 गुरप्रीत जी सही फ़रमाया आपने
Comment by नाथ सोनांचली on March 31, 2017 at 9:24am
आदरणीय निलेश भाई जी सादर अभिवादन, आप लोगो से बहुत कुछ सीखना है, और ओ बी ओ मंच निश्चय ही मुझे कुछ सिखाएगा, आपका ह्रदय तल से आभार

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