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सजी दुल्हन के जोड़े में, हंसी वो रूप की रानी।
सुनहरे रंग की बिंदिया, चमक माथे पे नूरानी।
हरी चूनर खिला चहरा, गुलाबी होंठ की लाली।
हजारों हुश्न देखे पर, नहीं उसका कोई सानी।

तुम्हारी सादगी देखी, तुम्हारा साज देखा है।
मगर हर रूप में जाना, जुदा अंदाज देखा है।
तुम्हारी सादगी चमके, कुमुदिनी फूल के जैसे।
तुम्हारे साज में हमने, सदा ऋतुराज देखा है।

खुली आंखें रहीं मेरी, अचानक देखकर उनको।
धरा पर ईश ने भेजा, रमा रति उर्वशी किसको।
अगर नख शिख करूं वर्णन, तो केवल लफ्जबाजी है।
हमारी मति हुई जड़ सी, निहारूं एकटक उनको।

तुम्हारी इक झलक पाकर, हमें इतनी खुशी होती।
किसी प्यासे को ज्यों पानी, किसी भूखे को ज्यों रोटी।
कई दिन से नहीं देखा, लगे कुछ गुम गया मेरा।
दिखे जब आज वो मुझको, मिला अनमोल सा मोती।

परायी वो अमानत है, मेरा अधिकार ना उस पर।
सड़क का एक पत्थर हूं, नहीं उसका कोई रहबर।
कदम से लग कहा मैंने, चले क्या साथ हम दोनों।
बनो मत बावले प्यारे, कहा उसने मुझे हंसकर।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 10, 2017 at 11:09pm
बड़े सुन्दर मुक्तक हुए त्रिपाठी जी..बधाई
Comment by Samar kabeer on July 10, 2017 at 10:36pm
जनाब विन्ध्येश्वरी जी,और बहना राजेश कुमारी जी आदाब,'अंदाज़'शब्द फ़ारसी भाषा का है, और 'ऋतुराज' शब्द या तो हिन्दी भाषा को होगा या संस्कृत भाषा का मैं नहीं जानता,और इनकी तुकान्तता किसी भी लिहाज़ से दुरुस्त नहीं हो सकती,ये बात समझने की ज़रूरत है,ज़िद पर अड़ जाने की नहीं,साफ़ ज़ाहिर है कि 'अंदाज़' में 'ज'के नीचे बिन्दी लगी है जो 'ऋतुराज'के 'ज'के नीचे नहीं लगी है,तो फैसला करने के लिये किसी जज के पास जाने की ज़रूरत नहीं आप ख़ुद ही फ़ैसला कर लीजिये की तुकान्तता सही होगी या ग़लत ? और इसके बावजूद आप यही कहें तो आपकी मर्ज़ी आप स्वतंत्र जो हैं ।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on July 10, 2017 at 6:42pm
आदरणीय गिरिराज सर आपका भूरिशः आभार
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on July 10, 2017 at 6:41pm
आदरणीया राजेश मैम! आपने रचना पर अपना बहुमूल्य समय और सुझाव दिया आपका आभार। सादर
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on July 10, 2017 at 6:40pm
आदरणीय लक्ष्मन सर! रचना पर आपने समय दिया,मैं हृदयतल से आभारी हूँ। सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 5, 2017 at 8:26pm

आ. विन्ध्येश्वरी भाई ... खूब सूरत मुक्तकों के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ ... आ. समर भाई जी की सलाह मुझे भी सही लगी ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 5, 2017 at 7:17pm

आद० विन्ध्येश्वरी प्रसाद जी बहुत ही सुंदर मुक्तक लिखें हैं बहुत बहुत बधाई लीजिये दूसरा मुक्तक पूर्णतः शिल्प पर कसा हुआ है बाकी तुकांतता के लिए विद्वद जन कह ही चुके हैं वैसे अंदाज और ऋतुराज की तुकांतता मेरे विचार से भी सही है 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 5, 2017 at 11:36am

 सुंदर और भापूर्ण मुक्तक रचे है \ मुक्तक में तुकांत के साथ ही समान्त का भी ध्यान रखा जाए तो और अच्छा माना जाता है हिसका निर्धारण प्रथम दो पंकितियों से होता है जो दुसरे मुक्तक में है |

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 4, 2017 at 12:30pm
आदरणीय सुरेंद्र सर आपका हार्दिक आभार
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 4, 2017 at 12:28pm
आदरणीय समर कबीर सर, सादर आभार। अंदाज और ऋतुराज के तुकांत में त्रुटि है लेकिन मैंने अंदाज़ को अंदाज लिखा है। अत: मुझ अल्पमति को ठीक लग रहा है। फिर भी गुरुजन इस पर अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया देंगे तो बात स्पष्ट हो सकेगी। इसके अलावा मैं तुकांत दोष समझ नहीं पा रहा हूं कि उनमें ऐसा कहां है?
सादर

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