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मात्रा विन्यास-
१२२२ १२२२ १२२२ १२२२

अभी भी याद आती हैं, सुहानी शाम की बातें।
बड़े ही चाव से करना, बिना वो काम की बातें।
कहा तुमने बहुत हमसे, सुना हमने बहुत लेकिन।
अधूरी आज भी चुभती, बिना अंजाम की बातें।

घने बरगद तले अपना, भरी वो दोपहर मिलना।
पसीने से सने चेहरे, दुपट्टे से हवा करना।
किया वादा तो पूरी पर, अधूरी आस थी अब भी।
जुदाई की घड़ी आयी, हथेली खीझ कर मलना।

चले चर्चा कोई जब भी, तेरा ही नाम आता है।
भुलाता हूं तुझे लेकिन, सुबह ओ शाम आता है।
अधूरे प्यार का किस्सा, अभी हिस्सा है यादों का।
कसम वो तीसरी तेरी, मरा गुलफाम जाता है।

चली दिल पर मेरे छूरी, शहादत पा गये हम तब।
तड़पता छोड़ कर मुझको, गये वो मुस्कुरा कर जब।
बिना उनके लगे सूना, कदम बढ़ते नहीं आगे।
नहीं मालूम मुझको है, दुबारा कब मिलेंगे अब।

बहुत मायूस दिन था वो, नहीं मैं मिल सका उनसे।
हुआ मुझसे ही धोखा ये, नहीं कोई गिला रब से।
अगर उनसे मिला होता, परेशां वो नहीं होते।
मुवाफी दीजिए हमको, खतां होगी नहीं अब से।

खुमारी सी रही तारी, नशा सा छा गया मुझ पर।
बढ़ी दिल की मेरे धड़कन, हुआ तन में अजब सरसर।
जमीं पर पांव ना टिकते, गगन में घूमता मानो।
हुआ दीदार जब उनका, समय भी रुक गया पल भर।

सभी उपमान फीके हैं, तुम्हारे रूप के आगे।
तपिश दीपक की जैसे हो, दहकते धूप के आगे।
नहीं ऐसा कोई पार्लर, संवारे रूप जो तेरा।
परियां भी लगे फीकी, मेरे महबूब के आगे।

परिंदा प्यार का यारों, मेरा मन शायराना है।
बुनूं मैं नीड़ शब्दों का, वहीं दुनिया बसाना है।
अगर तुम आ सको आओ, क्षितिज तक हम उड़ेंगे।
मुहब्बत-पंख की ताकत, हमें भी आजमाना है।

बहुत वो खूबसूरत था, तुम्हारा साथ ऐ हमदम।
कहें दो चार पल की क्या, हमें सौ साल लगते कम।
मिले मौका गुजारें हम, वहीं कुछ उम्र तक रुक कर।
जुदा होने की बातें सुन, हुई थी आंख अपनी नम।

कहूं मैं बात क्या मन की, है मेरा मन नहीं मेरा।
हुआ वश में तुम्हारे ये, है जादू कौन सा फेरा।
दशा मेरी है पागल सी, नहीं कुछ सूझता मुझको।
दिखे हर एक कण में ही, सलोना रूप वह तेरा।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 1, 2017 at 10:12pm
आदरणीय आशीष जी सादर आभार
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 1, 2017 at 10:11pm
आदरणीय मो. आरिफ सर, सादर आभार
Comment by आशीष यादव on April 1, 2017 at 2:37pm
बहुत सुंदर । एक दूसरे से बँधे से और मुक्तक भी। बहुत बहुत बधाई
Comment by Mohammed Arif on April 1, 2017 at 2:28pm
आदरणीय विन्ध्येश्वरी प्रसाद जी आदाब, बहुत बेहतरीन मुक्तक । बह्र के संबंध में गुणीजन अपनी राय देंगे । मेरी ओर से ढेरों बधाईयाँ ।

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