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हो सके मुस्कुरा दीजिये

212 212 212
चाहतों का सिला दीजिये ।
हो सके मुस्कुरा दीजिये ।।

टूट जाए न् ये जिंदगी।
हौसला कुछ बढा दीजिये।।

गफलतें हो चुकी हैं बहुत ।
रुख़ से पर्दा हटा दीजिये ।।

देखिए हाल बेहाल क्यूँ ।
आप ही कुछ दवा दीजिये ।।

बेवफा कह दिया क्यो उसे ।
राज है क्या बता दीजिये ।।

लूट कर ले गई सब नजर ।
यह रपट भी लिखा दीजिये ।।

टूटकर वह बिखर ही गई ।
जाइये घर बसा दीजिये ।।

है जरूरी मुलाकात भी ।
रास्ता इक बना दीजिये ।।

दीजिये जाम उसको मगर ।
थोड़ा पानी मिला दीजिये ।।

जो हुई थी ग़ज़ल याद में ।
आज फिर वह सुना दीजिये ।।

वह बहुत कह चुका है बुरा ।
आइना अब दिखा दीजिये ।।

उम्र कातिल हुई आपकी ।
तीर सारे चला दीजिये ।।

नींद आती नहीं रात भर ।
ख़त पुराने जला दीजिये ।।

--नवीन मणि त्रिपाठी

मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Naveen Mani Tripathi on April 18, 2017 at 6:37pm
आ0 रवि शुक्ला साहब
आ0 सुरेंद्र नाथ साहब
आ0 आरिफ साहब
आ0 कबीर सर
सबको नमन के साथ आभार ।
Comment by Ravi Shukla on April 18, 2017 at 2:56pm

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी अच्छी ग़ज़ल हुई है, बधाई

Comment by नाथ सोनांचली on April 16, 2017 at 11:10am
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by नाथ सोनांचली on April 16, 2017 at 11:10am
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by नाथ सोनांचली on April 16, 2017 at 11:10am
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by Mohammed Arif on April 15, 2017 at 5:47pm
आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब, बहुत बढ़िया छोटी बह्र की ग़ज़ल । शे'र दर शे'र मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए । बाक़ी आली जनाब समर कबीर साहब की बातों पर ग़ौर करें ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on April 15, 2017 at 4:02pm
आ0 सर सादर नमन । ठीक करता हूँ सर ।
Comment by Samar kabeer on April 15, 2017 at 3:08pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
मतले के ऊला मिसरे में :-
'रहमतों का सिला दीजिये'
बेतुका पन है,'रहमत'तो ख़ुद ही सिला हैं,इस मिसरे को यूँ कीजिये:-
'चाहतों का सिला दीजिये'
5वें शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ देखें ।

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