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यकीं के बाम पे ...


यकीं के बाम पे ...

हो जाता है
सब कुछ फ़ना
जब जिस्म
ख़ाक नशीं
हो जाता है
गलत है

मेरे नदीम
न मैं वहम हूँ
न तुम वहम हो
बावज़ूद
ज़िस्मानी हस्ती के
खाकनशीं होने पर भी
वज़ूद रूह का
क़ायनात के
ज़र्रे ज़र्रे में
ज़िंदा रहता है

ज़िंदगी तो
उन्स का नाम है
बे-जिस्म होने के बाद भी
रूहों में
इश्क का अलाव
फ़िज़ाओं की धड़कनों में
ज़िंदा रहता है

लम्हे मुहब्बत के
इतनी आसानी से
फ़ना नहीं होते
वस्ल के लम्हों में
कुछ भी दरमियाँ नहीं होता
तू और मैं का फ़र्क
मिट जाता है
शर्मों हया का हिज़ाब
हट जाता है
साये जिस्म बन जाते हैं
हकीकत को गुनगुनाते हैं
रूह से
जिस्म का मुलम्मा हट जाता है
हिज़्र का
डर नहीं होता
यकीं के बाम पे
बस इक पाक गौहर सी
ज़िंदगी होती है
आसमानों की
चादर ओढ़कर
मुहब्बत
चैन की नींद सोती है

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 570

Comment

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Comment by Samar kabeer on May 4, 2017 at 6:44pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत ख़ूब, बहुत जज़्बाती कविता,हमेशा की तरह आपने अपने क़लम का जादू जगाया है, और पाठक को बांधने में कामयाब हुए हैं,इस शानदार प्रस्तुति पर दिल से ढेरों बधाई स्वीकार करें ।
सही शब्द है "वह्म" और 'शर्मों हया' नहीं "शर्म-ओ-हया"
Comment by Sushil Sarna on May 1, 2017 at 6:42pm

आ.मो.आरिफ साहिब सृजन को अपनी आत्मीय सराहना से अलंकृत करने का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on May 1, 2017 at 6:41pm

आदरणीय गिरिराज जी भाई साहिब सृजन को आपकी प्रशंसा का आशीर्वाद मिला , सृजन उपकृत हुआ  ... आपका हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on May 1, 2017 at 6:39pm

आदरणीय बृजेश जी सृजन को आपने आत्मीय भावों से प्रशंसित करने का हार्दिक आभार। 

Comment by Mohammed Arif on May 1, 2017 at 2:02pm
आदरणीय सुशील सरना जी आदाब, बहुत ख़ूबसूरत प्रेमासिक्त भावों का गुलदस्ता । बधाई स्वीकार करें ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 1, 2017 at 10:24am

आदरणीय सुशील भाई , मुहब्बात की जाविदानी को लल्फाज़ से खूब सजाया है ... हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 29, 2017 at 10:29pm
वाह आदरणीय क्या शानदार ढंग से भावों को शब्द रूपी मोतियों मे ढाला है..बहुत ही बेहतरीन कविता हुई..सादर

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